मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, June 18, 2011

“अपना-अपना भाग्य” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



कोई काँटों की पीड़ा में खिल जाएगा।
कोई गर्मी के मौसम में जल जाएगा।।


खिल रहे हैं चमन में हजारों सुमन,
भाग्य कब जाने किस का बदल जायेगा! 

कोई श्रृंगार देवों का  बन जायेगा,

कोई जाकर के माटी में मिल जायेगा!! 



कोई यौवन में  भरकर हँसेगा कहीं,
कोई खिलने से पहले ही ढल जायेगा! 

कोई अर्थी पे होगा सुशोभित कहीं,
कोई पूजा की थाली में इठलायेगा!  

हार पुष्पांजलि का बनेगा  कोई,
कोई  जूड़े में गोरी के गुँथ जायेगा!

11 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

आदरणीय मयंक जी की रचना एक हक़ीक़त है और वह भी हक़ीक़त है जो हमने आज उनके बारे में कहा है। इस पोस्ट को आप निम्न लिंक पर देख सकते हैं।
चर्चामंच की स्थापना आदरणीय रूपचंद शास्त्री मयंक जी ने की - Dr. Anwer Jamal

एस.एम.मासूम said...

हार पुष्पांजलि का बनेगा कोई,
कोई जूड़े में गोरी के गुँथ जायेगा!
.
बहुत खूब

Vivek Jain said...

आदरणीय मयंक जी, बहुत ही अच्छा लिखा है आपने,
आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

वाणी गीत said...

हर पुष्प का अपना - अपना भाग्य ...
सत्य !

वीना said...

कोई अर्थी पे होगा सुशोभित कहीं,
कोई पूजा की थाली में इठलायेगा!

बहुत ही बढ़िया और सत्य भी है...किस फूल की किस्मत में क्या है....किसको पता...

Navin C. Chaturvedi said...

पुष्प के प्रारब्ध पर सुंदर प्रस्तुति| बधाई शास्त्री जी|

शारदा अरोरा said...

badhiya prastuti

कुश्वंश said...

चाह नहीं में सुरबाला के गहनों में गूथा जाऊं.... के सद्रश्य पहुचती कविता शास्त्री जी आपकी लेखनी का जवाब नहीं , साहित्य की धरोहर है

Kunwar Kusumesh said...

खिल रहे हैं चमन में हजारों सुमन,
भाग्य कब जाने किस का बदल जायेगा!

बहुत सही बात कही है शेर के ज़रिये आपने.बढिया रचना.

शालिनी कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

योगेश वैष्णव "योगी" said...

हुजुर...जिंदाबाद...ये ही वो दीदावर है...जिनकी पैदाइश को हजारो साल नर्गिसों ने रो रोकर गुजरे है..मुबारकें !!