मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, June 16, 2011

विश्व शांति और मानव एकता के लिए हज़रत अली की ज़िंदगी सचमुच एक आदर्श है


तेरह रजब के मौक़े पर आओ ये अहद लें
मसलक हो ख्वाह  कोई भी मिलकर रहेंगे हम
अल्लाह और क़ुरआनो नबी हैं हमारे एक 
एक दूसरे पे कुफ़्र के फ़तवे न देंगे हम

    -असद रज़ा
तेरह रजब-अरबी माह रजब की तेरह तारीख़
अहद-संकल्प, ख्वाह-चाहे
कुफ़्र-अधर्म, नास्तिक्य, फ़तवा-धार्मिक निर्णय

कल तेरह रजब थी। इस दिन हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु पैदा हुए थे। जब भी सही और ग़लत के बीच फ़ैसले की नौबत आई तो उन्होंने हमेशा सत्य और न्याय को ही चुना। बचपन से ही उनका यह मिज़ाज था। इसी अभ्यास के कारण उनका चरित्र ऐसा बन गया था कि उनसे जीवन में कभी फ़ैसले की कोई ग़लती नहीं हुई और यही वजह है कि उनकी ज़िन्दगी में भी हमें कोई ग़लती नज़र नहीं आती। उनकी इस बात की गवाही उनसे युद्ध करने वालों ने भी दी है। अपने ख़ून के प्यासों पर भी उन्होंने कभी कुफ़्र का फ़तवा लागू नहीं किया। उनकी ज़िंदगी लोगों को शांति, एकता और भाईचारे का पाठ पढ़ाने में ही गुज़र गई और एक रोज़ जब वह मालिक का नाम ले रहे थे तो उनके सिर पर एक दुश्मन ने तलवार मारी और कुछ दिन बाद हज़रत अली रज़ि. शहीद हो गए। विश्व शांति और मानव एकता के लिए उनकी ज़िंदगी सचमुच एक आदर्श है।
इस विषय में ज़्यादा जानने के लिए आप देख सकते हैं :

हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम जीवन परिचय व चारित्रिक विशेषताऐं


11 comments:

Kunwar Kusumesh said...

बहुत बढ़िया.

Kunwar Kusumesh said...

जब जब दिखेंगे अच्छे अशआर यहाँ पर.
आऊँगा नज़र तब-तब,मैं यार यहाँ पर.

prerna argal said...

bahut achchi jaankaarai deti hui saarthak rachanaa.badhaai.

DR. ANWER JAMAL said...

@ कुंवर जी और प्रेरणा जी ! आपका शुक्रिया !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

krati said...

khoobsorat behad khoobsorat.

शालिनी कौशिक said...

satya aur nyay jiske jeevan ke ang hain uske jeevan me trutiyon ko khojna to suraj me dag dhondhne jaisa hai..asad raza ji ki bahut sundar bhavna ko aapne bahut sundar sanyojan se prastut kiya hai.badhai.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी जानकारी ... सार्थक पोस्ट

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय मयंक जी ! आपके कथनासुसार मैंने आज चर्चामंच की आपके द्वारा प्रस्तुत पोस्ट देखी है लेकिन मुशायरा ब्लॉग की पोस्ट का शीर्षक मुझे नज़र नहीं आया । शायद किसी वजह से वह एड होने से रह गया है ।

एस.एम.मासूम said...

तेरह रजब के मौक़े पर आओ ये अहद लें
मसलक हो ख्वाह कोई भी मिलकर रहेंगे हम
अल्लाह और क़ुरआनो नबी हैं हमारे एक
एक दूसरे पे कुफ़्र के फ़तवे न देंगे हम
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हजरत अ;ली (अ.स) कि विलादत के मौके पे इतना बेहतरीन लेख पेश करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया. यह जो अशार हैं यही मकसद इ हजरत अली(अ.स) भी था लेकिन इसको बहुत से लोग समझ ना सके.

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय मयंक जी ! ईमेल के अनुसार आपके कहने के मुताबिक़ चर्चामंच की पोस्ट देखी तो ‘ज़िंदगी सचमुच एक आदर्श है‘ में इस पोस्ट का लिंक मिल गया। शुक्रिया !!