मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, June 15, 2011

कुछ बात करो ...डा श्याम गुप्त ...

अब न चुप दिलदार रहो कुछ बात करो ,
बात न भी हो  तो भी  यूं ही  बात करो |
इसरार व इकरार पर ही  तकरार करें ,
चलो बेबात ही झगड़ो, कुछ बात करो  ||   

4 comments:

prerna argal said...

bahut badiyaa najm.badhaai.

शालिनी कौशिक said...

चलो बेबात ही झगड़ो, कुछ बात करो ||
chaliye aaj tippani ke roop me nahi balki sher ke madhyam se aapne apni bhavnaon ko abhivyakt kiya hai.bahut sundar.

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद प्रेरणा जी व शालिनी जी.....संवादहीनता सबसे अधिक कठिन व दुखदायी परिस्थिति होती है.....
" वो दुश्मनी से देखते हैं, देखते तो हैं ,
मैं शाद हूँ कि हूँ तो उनकी निगाह में ||"

Navin C. Chaturvedi said...

कुतर्क से पहले तक संवाद तो होना ही चाहिए| संवाद से ही रास्ते खुलते हैं|