मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, June 14, 2011

कुछ करूँ तेरे लिये

आ आंखों ही आंखों में
तेरी आत्मा को चूम लूँ
बिना तेरा स्पर्श किए
तेरे हर अहसास को छू लूँ
बिना तेरा नाम लिए
तेरी ज़िन्दगी को रोशन कर दूँ
तेरे हर ख्वाब को
बिना तेरे देखे पूरा कर दूँ
तेरे हर ज़ख्म को
बिना तुझ तक पहुंचे
अपने सीने में छुपा लूँ
तेरी हर साँस पर
अपनी सांसों का पहरा लगा दूँ
तेरे हर मचलते अरमान को
बिना तेरे जाने
अपने आगोश में ले लूँ
तेरी हर उदासी को
बिना तुझ तक पहुंचे
ख़ुद में समेट लूँ
तेरी आत्मा के हर बोझ को
बिना तेरे झेले
मैं ख़ुद उठा लूँ
आ तेरी रूह की थकन को
कुछ सुकून पहुँचा दूँ

7 comments:

शालिनी कौशिक said...

तेरी ज़िन्दगी को रोशन कर दूँ
तेरे हर ख्वाब को
बिना तेरे देखे पूरा कर दूँ
तेरे हर ज़ख्म को
बिना तुझ तक पहुंचे
अपने सीने में छुपा लूँ
ek pyar se bhara man hi aisee khoobsurat abhivyakti kar sakta hai.bahut sundar .

डा. श्याम गुप्त said...

अच्छा वक्तव्य ......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचना!

prerna argal said...

तेरे हर मचलते अरमान को
बिना तेरे जाने
अपने आगोश में ले लूँ
तेरी हर उदासी को
बिना तुझ तक पहुंचे
ख़ुद में समेट लूँ
तेरी आत्मा के हर बोझ को
बिना तेरे झेले
मैं ख़ुद उठा लूँ
bahut sunder rachanaa.sunder shabdon ka chyan.badhaai.

Vivek Jain said...

तेरी आत्मा के हर बोझ को
बिना तेरे झेले
मैं ख़ुद उठा लूँ

वाह, बहुत सुंदर,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

कुश्वंश said...

बहुत सुन्दर रचना

Navin C. Chaturvedi said...

प्रेम और समर्पण का अप्रतिम उदाहरण|