मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, June 13, 2011

" ग़ज़ल-इबादत का ढोंग..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जो परिन्दे के पर कतरता है।
वो इबादत का ढोंग करता है।।

जो कभी बन नही सका अपना,
दम वही दोस्ती का भरता है।

दीन-ईमान को जो छोड़ रहा,
कब्र में पाँव खुद ही धरता है।

पार उसका लगा सफीना है,
जो नही ज़लज़लों से डरता है।

इन्तहा जिसने जुल्म की की है,
वो तो कुत्ते की मौत मरता है।

8 comments:

डा. श्याम गुप्त said...

इन्तहा जिसने जुल्म की की है,
वो तो कुत्ते की मौत मरता है।----वाह क्या बात है..सुन्दर...

नीरज गोस्वामी said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल है...दाद कबूल करें

नीरज

AlbelaKhatri.com said...

waah ji waah !

khoob kaha ...........

वन्दना said...

बहुत ही सुन्दर गज़ल कही है…………तारीफ़ के काबिल्।

शालिनी कौशिक said...

इन्तहा जिसने जुल्म की की है,
वो तो कुत्ते की मौत मरता है।
shastri ji vastav me mujhe ye aapki sarvshresth bat lagi hai.bahut khoob.

Kailash C Sharma said...

बहुत ख़ूबसूरत गज़ल...

Vaanbhatt said...

सटीक...सीधे दिल से...

Navin C. Chaturvedi said...

पार उसका लगा सफीना है,
जो नही ज़लज़लों से डरता है।

बहुत खूब शास्त्री जी|