मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, June 12, 2011

सच..... डा श्याम गुप्त ...

सच बड़ी बड़ी किताबों में बंद है,
क्योंकि बाहर की दुनिया बड़ी हुनरमंद है |
झूठ को ही सच बना लेती है,
ज़िंदगी का फलसफा सजा लेती है ||                    

9 comments:

वन्दना said...

सुन्दर्।

शिखा कौशिक said...

bahut khoob !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

शेर पढ़कर तो यह लगा कि श्याम गुप्त किताबों से भी ज्यादा हुनरमन्द हो गये हैं!

DR. ANWER JAMAL said...

बड़ी किताब का सच फ़ोल्डर में लाना होगा
फिर गाँव गली और घर घर जाना होगा

शालिनी कौशिक said...

bahut sundar abhivyakti.

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद .. आजकल हर एरा गेरा अपनी अपनी फिलासफी कहता रहता है ..और लोग भी कहने लगते हैं ...सबका अपना अपना विचार है ...शास्त्र, आप्त बचन, प्रमाण-प्रमेय का कोइ अर्थ नहीं...

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद, अनवर जी....वास्तव में शास्त्रादि के पठन- पाठन का क्रम प्रारम्भ करना होगा...ब्लॉग पर कई ब्लोगर कर भी रहे हैं ...और जैसा आपने शानदार शेर में कहा ...जन जन तक पहुंचाना होगा...

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शास्त्री जी...आभार...पहले किताबें( अन्य के अनुभव ,शास्त्रादि, इतिहास , विज्ञान आदि) पढकर ही व्यक्ति हुनर सीखने लायक होता व सीखता है...फिर श्रृद्धा-विश्वास सहित अपने अनुभव/कर्म की कसौटी पर उन्हें चरितार्थ करके अपने अनुभव जोडते हुए नए शास्त्रों की रचना करता है..यही प्रगति है...

Navin C. Chaturvedi said...

वाह क्या बात है| वाक़ई, इस हुनरमंद दुनिया ने हर सच को क़िताबों में बंद कर रखा है| शेरोशायरी का मज़ा ही और है|