मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, June 10, 2011

मिस्र का बाज़ार

अब मेरा क़ाफ़ला सालार नहीं है कोई
और मेरे सर पे भी दस्तार नहीं है कोई ।
जिस को बिकना है वह बिक जाए कहीं भी जाकर
अब यहाँ मिस्र का बाज़ार नहीं है कोई ।
तहसीन मुनव्वर
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8 comments:

शालिनी कौशिक said...

bahut khoob.urdu hai hi aise jaban kee n chahe bhi man iski aur khincha jata hai.

prerna argal said...

bahut shaandaar rachanaa.urdoo ke shabdon ka aerth bhi likh de to hum urdoo naa samajhne waalon ko samajhne main aasani rahegi.dhanyawaad.



please visit my blog.thanks

शालिनी कौशिक said...

prerna ji ki bat zaroor mane ye ham sabhi ke liye behtar shruaat rahegi.

वन्दना said...

बहुत खूब्।

Kunwar Kusumesh said...

वाह क्या बात है तहसीन मुनव्वर भाई,
आप-सा वाक़ई फ़नकार नहीं है कोई.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

veerubhai said...

वाह साहब वाह !बेहतरीन अशार आपके .शुक्रिया .

Navin C. Chaturvedi said...

खूबसूरत क़ता| बहुत ख़ूब| बहुत बहुत मुबारक| ये सिर्फ़ एक शे'र नहीं बल्कि एक अध्ययन है, एक सोच है और एक फ़लसफा| मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान के आज के नीति नियंताओं को ले कर आप ने बहुत जोरदार बात कही है|
एक क़ता आपकी शान में|

वाह क्या खूब कही बात पते की, वाकई|
'मोल' के झोल का उपचार नहीं है कोई||

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अन्य मित्रों के लिए:-

सालार - सेनापति
दस्तार - पगड़ी