मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, June 8, 2011

काँए काँए कर रहे हैं आज इस गुलशन में ज़ाग़



उफ़ सियासत की तमाज़त से वह मुरझाने लगा
कल जो गाँधी जी ने अपने खून से सीँचा था बाग ।
अँदलीबाने चमन तो सब चमन से उड़ गए
काँए काँए कर रहे हैं आज इस गुलशन में ज़ाग़ ।
                                 -मतीन अमरोही


शब्दार्थ:
अँदलीबाने चमन-बाग़ की बुलबुलें

ज़ाग़-काग, कौआ
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6 comments:

शालिनी कौशिक said...

SACHCHAI BAYAN KARTI PRASTUTI.MATEEN AMROHI JI KO BAHUT BAHUT BADHAI SUNDAR ABHIVYAKTI KE LIYE AUR AYAZ JI KO SUNDAR PRASTUTI KE LIYE.

डा. श्याम गुप्त said...

सुन्दर, सटीक व सामयिक अभिव्यक्ति , बधाई ..

---मुझे लगता है ..अंतिम पंक्ति में ..गुलशन में 'जाग' के स्थान पर 'काग' होना चाहिए...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया!

prerna argal said...

sachchai bayaan karati hui shaandaar prastuti,badhaai

Dr. Ayaz Ahmad said...

हौसला बढ़ाने के लिए सभी लोगों का शुक्रिया

veerubhai said...

शुक्रिया !बेहतरीन अलफ़ाज़ ,अंदाज़ आपके ,सियासत को आइना दिखलाते हैं आप .