मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, June 7, 2011

चर्चा नहीं होता...गज़ल..डा श्याम गुप्त...

हमारी नज़र झुक जाए कोई  चर्चा नहीं होता |
शराफत में झुकीं नज़रें,कोइ चर्चा नहीं होता |

वो नज़रें  झुका लेते हैं ,  हया की बात होती है ,
नज़र अपनी भी झुकती है,कोइ चर्चा नहीं होता 

गुरुरे-हुश्न में नज़रें मिलीं तो हया कह डाला,
सुरूरे-इश्क नज़रों का, कोइ चर्चा नहीं होता |

जवानी, हुश्न, शानो-शौक ने एसा गज़ब ढाया,
जहां की नज़रें झुक जाएँ, कोई चर्चा नहीं होता |

भरी नज़रों का धोका है, नज़र की शोखियाँ ही तो,
वो उनकी शोख नज़रों का कोई चर्चा नहीं होता |

नज़र के तीर की बातें भला अब क्या करे कोई,
न जाने कितने घायल हैं कोई चर्चा नहीं होता |

न उनके शोख ज़लवों की, श्याम चर्चा चले कोई,
शहर में उनका ज़लवा है,कोई चर्चा नहीं होता |

न अब चर्चा की कोई बात कर,चर्चा में आ ऐ श्याम,
यही  चर्चा  शहर में  है,  कोई  चर्चा  नहीं  होता ||





10 comments:

शालिनी कौशिक said...

वो नज़रें झुका लेते हैं , हया की बात होती है ,
नज़र अपनी भी झुकती है,कोइ चर्चा नहीं होता
bahut sundar gazal .par aashcharya ye hai ki blog jagat me charcha nahi hota.

Navin C. Chaturvedi said...

'मुफ़ाईलुन' पकड़ के जो ग़ज़ल कहते तरीके से|
ग़ज़ल की बह्र में उन को कभी धोखा नहीं होता||

आद. श्याम भाई साब आप के खयाल बहुत जोरदार हैं इस प्रस्तुति में| बधाई स्वीकार करें|

Kunwar Kusumesh said...

यहाँ बहरो-वज़न क्या, काफ़िया तक तो नदारद है.
मुफ़ाईलुन को हो तकलीफ़, ये अच्छा नहीं होता.

Dr. Ayaz Ahmad said...

सुंदर ग़ज़ल

JHAROKHA said...

bahut bahut hi shandar v jabar dast lagi aapki gazal .han! gazal ko padhne ke baad mere hoth aap ki hi
gazal ki charcha me mashgul hain .
bahut khoob ----wah-wah--
bahut bahut dili badhai
poonam

डा. श्याम गुप्त said...

---धन्यवाद चतुर्वेदी जी,कुंवर जी,
मिलें नज़रें हसीनों से, फिसल जाना जरूरी है |
बहर का काफिये का क्या,गज़ल होना जरूरी है|

गज़ल की बात हो,क्या तरीका या फ़ाइलुन ऐ दोस्त!
नज़र से नज़र मिलना और गज़ल होना जरूरी है |

आरजू जो गज़ल की,कुछ कायदा मत देख |
ग़ज़लों में अंदाज़े बयां , तेरा जरूरी है |

बस गज़ल होजाए, चाहे धोखा ही क्यूं ना हो,
वह गज़ल क्या जिसमें कोइ धोखा नहीं होता ||

(गज़ल = हसीनों से/की प्रेम भरी हसीन बातें होना /करना/सुनना )

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शालिनी,पूनम व अयाज़ जी....शहर में उनका चर्चा है...

veerubhai said...

भरी नजरों का धोखा है ,नजर की शौखियाँ ही तो ,
वो उनकी शौख नजरों का ,कोई चर्चा नहीं होता ।
ग़ज़ल से ज्यादा हजरात आपकी गुफ़्त -गू में मजा आया .
एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,बिलकुल तेरे जैसी हो ,
मेरा चाहे कुछ भी हो ,तेरी ऐसी तैसी हो .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

पूरी ग़़ज़ल में शब्दों की पुनरावृत्ति की गई है!
--
बेकार में अपना और दूसरों का समय नष्ट किया है
ग़ज़लकार ने!

Dr. shyam gupta said...

यही तो गज़ल की खासियत है हुज़ूर...

समझ में जब नहीं आती,कहें आँगन ही टेडा है |
खास हो वही तो होती गज़ल है श्याम'की ए दोस्त |