मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, June 6, 2011

मंज़िल

बात इतनी न टालिए साहब
दर्द इतना न पालिए साहब ।
कोई मंज़िल तो ढूँढिए आख़िर
कोई रस्ता निकालिए  साहब ।

तहसीन मुनव्वर
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7 comments:

शालिनी कौशिक said...

bahut bahut shandar.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आज तो टिप्पणी मे यही कहूँगा कि बहुत उम्दा मिसरा है यह!

एक मिसरा यह भी देख लें!

दर्देदिल ग़ज़ल के मिसरों में उभर आया है
खुश्क आँखों में समन्दर सा उतर आया है

Kunwar Kusumesh said...

दाद देता हूँ इस क़ता पर मैं,
दाद को तो संभालिये साहब.

DR. ANWER JAMAL said...

चार मिसरों के क़तए पर
चार की दाद सँभालिए साहब

वाह !

Navin C. Chaturvedi said...

भाई चाय के साथ इस पोस्ट को पढ़ने का मजा आ गया| लगे हाथों हम भी कुछ तुकबंदी जोड़ ही देते हैं:-

फाँस दिल की निकालिए साहब
सल्तनत, तब संभालिए साहब

आज का काम आज ही करिए
इस को कल पे न टालिए साहब

वक़्त कब से बता रहा तुमको
वक़्त को यूं न घालिए साहब

सब के दिल में जगह मिले तुमको
इस तरह खुद को ढालिए साहब

शौक़ हर कोई पालता है यां
कुछ 'भला' तुम भी पालिए साहब

इस जहाँ में बहुत अँधेरा है
दिल जला, दीप बालिए साहब

गो ज़माने में नाम करना है
कोई शोशा उछालिए साहब

भैया ये आखिरी वाला करने लायक काम नहीं है| बस तुकबंदी की खातिर जोड़ दिया है

डा. श्याम गुप्त said...

मुर्गा और बोतल ले आया हूँ साहब,
मेरा ये काम कर दीजिए साहब |

मैडम को खुश कर आया हूँ साहब,
मेरी तो फ़ाइल निकालिए साहब |

Dr. Ayaz Ahmad said...

आप सभी शोरा ए इकराम का तहे दिल शुक्रिया !