मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, June 5, 2011

ठाठ से रहते ए सी बंगले में / हम अगर बेज़मीर हो जाते - व्यंग्य, कविता

राह पर चलते गर करप्शन की
कुछ ही दिन में अमीर हो जाते
ठाठ से रहते ए सी बंगले में
हम अगर बेज़मीर हो जाते

-Asad Raza

7 comments:

prerna argal said...

curraption per byang karati hui bahut achchi najm.badhaai sweekaren.

SANJEEV SINGHAL said...

wah kya khoob

डा. श्याम गुप्त said...

वाह! क्या खूब...

Kunwar Kusumesh said...

लोग जो बेज़मीर होते हैं.
वास्तव में फ़क़ीर होते हैं.

Vaanbhatt said...

भाई ये ज़मीर किस चिड़िया का नाम है इस देश में...कीचड़ ने कमल को निगल लिया है...करप्शन तो कल्चर बन गया है...

Sunil Kumar said...

वाह! क्या खूब.

शालिनी कौशिक said...

bahut khoob .