मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, June 2, 2011

माँ शारदे !...ग़ज़ल....डा श्याम गुप्त.....

वन्दना के स्वर गज़ल में कह सकूं माँ शारदे !
कुछ शायरी के भाव का भी ज्ञान दो माँ  शारदे !  

माँ की कृपा यदि हो  न तो कैसे ग़ज़ल साकार हो,
कुछ कलमकारी का मुझे भी ज्ञान दो माँ शारदे !

मैं जीव,  माया बंधनों में,   स्वयं को भूला हुआ,
नव-स्वरलहरियों से हे माँ! हृद-तंत्र को झंकार दे |

मैं स्वयं को पहचान लूं , उस आत्मतत्व को जान लूं ,
अंतर में,  अंतर बसे उस,  पर-ब्रह्म को गुंजार दे  |

हे श्वेत कमलासना माँ ! हे शुभ्र वस्त्र से आवृता ,
वीणा औ पुस्तक कर धरे,यह नत-नमन लो शारदे !

मैं बुद्धि हीन हूँ काव्य-सुर का ज्ञान भी मुझको नहीं,
उर ग़ज़ल के स्वर बह सकें, कर वीणा की टंकार दे |

ये वन्दना के स्वर-सुमन, अर्पण हैं  माँ स्वीकार लो,
हो धन्य जीवन ,श्याम का,बस कृपा हो माँ शारदे !





4 comments:

शालिनी कौशिक said...

मैं बुद्धि हीन हूँ काव्य-सुर का ज्ञान भी मुझको नहीं,
उर ग़ज़ल के स्वर बह सकें, कर वीणा की टंकार दे
maa sharde bhi aaj aapki satya priyta se prasann ho hi jayengi.bahut sundar bhavabhivyakti.

शिखा कौशिक said...

माँ की कृपा यदि हो न तो कैसे ग़ज़ल साकार हो,
कुछ कलमकारी का मुझे भी ज्ञान दो माँ शारदे
ham sab bhi milkar yahi aaradhna kar rahe hain ki aapki manokamna poorn ho.sundar bhav abhivyakti.badhai.

कुश्वंश said...

सुन्दर ग़ज़ल , प्रयास कभी निरर्थक नहीं जाते , शुभकामनाये

dr. shama khan said...

bhejen ko gezel me gungunane ka andaj khubsuret hea...