मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, May 2, 2011

बे सरो सामानी (ग़ज़ल) Urdu Ghazal


जब से तुम्हारे शहर की वीरानी बढ़ गई
मेरे जुनूं की बे सरो-सामानी बढ़ गई

क़ारून भी बेचारे तवंगर न हो सके
दौलत बढ़ी तो और भी अरज़ानी बढ़ गई

दीवाने आ रहे हैं बयाबाँ को छोड़कर
यूं ही नहीं चमन में बयाबानी बढ़ गई

यह नस्ले-नो तो क़ैद कोई मानती नहीं
ऐसी हवा चली है कि मनमानी बढ़ गई

‘महज़र‘ की ग़ज़ल सुनके बहुत लोग खुश हैं
कुछ दोस्तों की यार परेशानी बढ़ गई

‘महज़र‘ ख़लीलाबादी
मौहल्ला भटवा, ख़लीलाबाद, संत नगर, 272175
उ. प्र.

शब्दार्थ
क़ारून हज़रत मूसा अ. के दौर का इतना बड़ा धनपति था कि उसके ख़ज़ानों की सिर्फ चाभियों के बक्से  उठाने के लिए सैकड़ों ऊंटों की ज़रुरत पड़ती थी.
तवंगर-समृद्ध , अरज़ानी-महंगाई
नस्ले-नो-नई नस्ल, क़ैद-बंधन 

5 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

एक मुक्म्मल गजल पेश करने के लिए मुबारकवाद!

ana said...

wah wah ershad

anupama's sukrity ! said...

badhia ghazal.

DR. ANWER JAMAL said...

आप सभी का शुक्रिया कि आपने ग़ज़ल को सराहा .

shanno said...

''क़ारून भी बेचारे तवंगर न हो सके
दौलत बढ़ी तो और भी अरज़ानी बढ़ गई''

वाह ! मजा आ गया ग़ज़ल पढ़कर...शुक्रिया.