मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, May 22, 2011

अलग रहने के बना लिए बहाने...Saleem Khan


दूर जाके मुझसे बना लिए ठिकाने

अलग रहने के बना लिए बहाने

बिछड़ के तुमने बहुत अश्क़ हैं दिए
उन्हीं अश्क़ से हमने बना लिए फ़साने

दौलत पे अपने तुम्हें रश्क है बहुत
हमने मुफ़लिसी को बना लिए ख़जाने

महलों में रहने वाली तुम खुश रहो सदा
हमने तो खंडहर में अब बना लिए ठिकाने



शहनाई बज उठी जब लाश पे 'सलीम'
मैंने उन्ही से अब अपने बना लिए तराने

4 comments:

वन्दना said...

सुन्दर गज़ल्।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

शहनाई बज उठी जब लाश पे 'सलीम'
मैंने उन्ही से अब अपने बना लिए तराने
--
यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही बढ़िया है मगर मक्ते का तो जवाब नहीं है!

DR. ANWER JAMAL said...

वाह ! अनोखी अदा ।

डा. श्याम गुप्त said...

वाह ! क्या बात है...क्या फ़साना है ...
--उन्हीं अश्क़ से हमने बना लिए फ़साने.