मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, May 29, 2011

श्री ज़ाकिर अली ‘रजनीश‘ जी की एक पोस्ट के संदर्भ में

मियां शुक्र करो कि कुछ तो मिला
आसानी से मिला या मुश्किलों से मिला

तवायफ़ों को मुल्ला पंडित क्या जानें
ठीक मिला पता जो काफ़िरों से मिला

भाई कलिमा पढ़कर संवार ले ज़िंदगी
क्या आज तक सिर्फ़ जाहिलों से मिला

फ़िरक़ाबंदी छोड़कर बन जा इंसान तू
अपने दिल को चल हमारे दिलों से मिला

किसी से मत करना ‘अनवर‘ का गिला
कि लगे मैं कहां संगदिलों से मिला

यह ग़ज़ल टाइप में से कुछ है।
क्या है ?
इसे तो बस जानने वाले जानें या फिर ख़ुदा जाने।
हमें तो यह सब मजबूरी में कहना पड़ा एक पोस्ट पर।
कल से श्री ज़ाकिर अली जी एक पोस्ट ब्लॉग जगत में इतना नचाए फिर रहे हैं कि वह हॉट हो गई।


मौलवी और पंडित घुमाते रहे, उसका पूरा पता काफिरों से मिला।



अब भला हमें कहां इतनी सहार ?
कि हमारे रहते कोई अच्छे मौलवी और अच्छे पंडित जी को बुरा कहता फिरे और वह भी नास्तिक-अधर्मी के लिए। हमने तुरंत जो मन में आया, लिख डाला इस पोस्ट के कमेंट में। अब आप बताएं कि हमने क्या ग़लत कहा ?
श्री अशोक रावत जी का कलाम भी इस बहाने यहां पेश किया जाता है, जिस पर यह कमेंट किया गया।
श्री अशोक रावत 

हाँ मिला तो मगर मुश्किलों से मिला।
आईनों का पता पत्‍थरों से मिला।

दोस्‍ती आ गई आज किस मोड़ पर,
दोस्‍तों का पता दुश्‍मनों से मिला।

मौलवी और पंडित घुमाते रहे,
उसका पूरा पता काफिरों से मिला।

ढ़ूँढ़ते- ढ़ूँढ़ते थक गया अंत में,
मुंसिफों का पता कातिलों से मिला।

जाने क्‍या लिख दिया उसने तकदीर में,
मुझको जो भी मिला मुश्किलों से मिला।

अड़चनें ही मेरी रहनुमा बन गईं,
मंजिलों का पता ठोकरों से मिला।
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/05/dr-anwer-jamal.html

4 comments:

prerna argal said...

फ़िरक़ाबंदी छोड़कर बन जा इंसान तू
अपने दिल को चल हमारे दिलों से मिला
bahut sunder sher.achchi najm.badhaai aapko.



please visit my blog and free feel to comment.thanks

डा. श्याम गुप्त said...

कुछ तो ढंग की बातें करो यारो,
यों बेसिर पैर की न धरो यारो ॥

शालिनी कौशिक said...

blog jagat ki imarat aap jaise bharosemand bloggars par hi thami hai.thanks

Ratan Singh Shekhawat said...

:)