मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, May 1, 2011

आज का दौर (ग़ज़ल) Ghazal


शहर में देखो जिसे ख़ौफ़ज़दा लगता है
फूल भी कोई बढ़ाए तो छुरा लगता है

हर मुसीबत से यह इक पल में छुड़ा देती है
मौत का नाम बज़ाहिर तो बुरा लगता है

शहर मेरा है मगर कोई नहीं है मेरा
यह मेरा शहर भी कू़फ़े से बड़ा लगता है

झील हो, दरिया हो, तालाब हो या झरना हो
जिस को देखो वही सागर से ख़फ़ा लगता है

उसकी आंखों में कभी झांक के देखो ‘सागर‘
गहरे ख़ामोश समंदर का पता लगता है













इक़बाल ‘सागर‘
उदयपुर , राजस्थान

कूफ़ा अरब के एक शहर का नाम है। पुराने दौर में इस शहर के लोगों से वफ़ा की उम्मीद नहीं की जाती थी।

9 comments:

डा. श्याम गुप्त said...

फूल भी कोई बढ़ाए तो छुरा लगता है---बहुत खूब--सुन्दर गज़ल....

शालिनी कौशिक said...

शहर मेरा है मगर कोई नहीं है मेरा
यह मेरा शहर भी कू़फ़े से बड़ा लगता
iqbal sagar ji kee ye nazm mujhe ek shayar sahab kee ye panktiyan yad dila gayee-
''koi hath bhi n milayega jo gale miloge tapaq se ,
ye naye mizaz ka shahar hai zara fasle se mila karo.
iqbal ji kee is nazm ko prastut karne ke liye bahut bahut aabhar.

shanno said...

शहर मेरा है मगर कोई नहीं है मेरा
यह मेरा शहर भी कू़फ़े से बड़ा लगता है

वाह ! वाह !

महेश बारमाटे "माही" said...

i m speachless...
bas itna kahna cahunga

aaj shabd kam pad gaye tareef me teri
ke lagta hai jaise aasmaa se foolon ki barsat hone hai lagi...

ana said...

bahut achchhi post.....sabhar

Neelam said...

फूल भी कोई बढ़ाए तो छुरा लगता है,

हर मुसीबत से यह इक पल में छुड़ा देती है
मौत का नाम बज़ाहिर तो बुरा लगता है.....Ufff, kya kahun shabd nahi khanjar hain..seedhe dil pe lage..

यह मेरा शहर भी कू़फ़े से बड़ा लगता है
behadd umda gazal.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

शानदार गजल पढ़वाने के लिए शुक्रिया!

DR. ANWER JAMAL said...

आप सभी का शुक्रिया कि आपने ग़ज़ल को सराहा .

ARVIND said...

उसकी आंखों में कभी झांक के देखो ‘सागर‘
गहरे ख़ामोश समंदर का पता लगता है

lajawab........