मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, May 20, 2011

आये थे तेरे शहर में - Sadhana Vaid



आये थे तेरे शहर में मेहमान की तरह,
लौटे हैं तेरे शहर से गुमनाम की तरह !

सोचा था हर एक फूल से बातें करेंगे हम,
हर फूल था हमको तेरे हमनाम की तरह !

हर शख्स के चहरे में तुझे ढूँढते थे हम ,
वो हमनवां छिपा था क्यों बेनाम की तरह !

हर रहगुज़र पे चलते रहे इस उम्मीद पे,
यह तो चलेगी साथ में हमराह की तरह !

हर फूल था खामोश, हर एक शख्स अजनबी,
भटका किये हर राह पर नाबाद की तरह !

अब सोचते हैं क्यों थी तेरी आरजू हमें,
जब तूने भुलाया था बुरे ख्वाब की तरह !

तू खुश रहे अपने फलक में आफताब बन,
हम भी सुकूँ से हैं ज़मीं पे ख़ाक की तरह !


साधना वैद

5 comments:

डा. श्याम गुप्त said...

तू खुश रहे अपने फलक में आफताब बन,
हम भी सुकूँ से हैं ज़मीं पे ख़ाक की तरह !---
--vaah!! kyaa samarpan hai...bahut khoob..

Kunwar Kusumesh said...

साधना वैद जी की रचना को खैर ग़ज़ल कहना तो सही नहीं दिखता मगर एक बात साफ़ है कि उनके अन्दर वो फ़न करवटें ले रहा है जो एक ग़ज़लगो में होता है.फिलहाल क़ाफ़िये का इल्म साधना जी को नहीं है जो एक बहुत बड़ा दोष है.उन्हें सजा मुतवाज़ी,सजा मुतर्रफ़ और सजा मुतवाज़िन तीनों प्रकार के क़ाफ़िये का ज्ञान होना ज़रूरी है.बाकी ग़ज़ल की बारीकियां बाद कि बात है. उनकी क़लम पसंद आई इसलिए मैंने इतनी बात लिखी. हाँ ,अगर उन्हें डॉ.श्याम गुप्ता कि स्टाइल में लिखना तो बात दीगर है.

DR. ANWER JAMAL said...

आदरणीय साधना वैद जी ! आपने ईमेल से सूचित किया कि आपने ध्यान नहीं दिया कि मेरी पोस्ट आज 8 बजे के लिए ड्राफ़्ट में पड़ी हुई है और आपने अपनी रचना पोस्ट कर दी है। इसके लिए आपने माज़रत भी चाही है।
मैं यह सब देखने के लिए इधर आया तो देखा कि कुछ करने से पहले ही कुंवर कुसुमेश जी का एक मूल्यवान कमेंट आ गया है लिहाज़ा अब इस रचना हटाना उचित न होगा।
इस रचना को ठीक-ठाक तवज्जो मिले इसीलिए मैंने अपनी पोस्ट हटा ली है। उसे मैं कुछ घंटों बाद डाल दूंगा और प्लीज़ आप इस का बोझ अपने दिल पर महसूस न कीजिएगा। हमें आपके विचार पसंद हैं, यह आप भी जानती हैं। जिन्हें हम पसंद करते हैं, उनके लिए कुछ कष्ट उठाने में केवल आनंद ही आता है।
आपको कुंवर साहब का यही कमेंट एक मेल के रूप में भी हमने फ़ॉरवर्ड किया है। जिसे पढ़कर आपको भारी भरकम परिभाषाएं मिलेंगी और आपको लगेगा कि इन्हें मैं कैसे सीख पाऊंगी ?
लेकिन हक़ीक़त यह है कि अगर समझाने वाला समझाना चाहे और शिष्य समझना चाहे तो चंद दिन में ही सारी बात समझ में आ जाती है और इसी का नाम ‘फ़न में महारत‘ होती है।
लोग शादियों में भी नाचते हैं और होली के हुल्लड़ में भी और नाचने वालों को और उन्हें देखने वालों को, सभी को मज़ा आता है। वह भी उल्लास को प्रकट करने का एक ज़रिया होता है। दूसरी ओर कत्थक आदि शास्त्रीय नृत्य होते हैं। यह मेहनत मांगता है। इसमें गहराई होती है और विश्व में जहां भी नृत्य की बात आती है तो वहां भारत का हुल्लड़ पेश करने के बजाय यही शास्त्रीय नृत्य पेश किया जाता है।
हमारा सौभाग्य है कि हमारे पास आप जैसी प्रतिभा भी है और फ़न ए शायरी में महारत ए ताम्मा रखने वाले कुंवर कुसुमेश जी भी हैं। कुंआ सामने है जो चाहे प्यास बुझाए।
आफ़र सबके लिए है।
शुक्रिया !

विशेष - आपकी रचना के भाव और शब्द दिल को छू गए हैं।

prerna argal said...

अब सोचते हैं क्यों थी तेरी आरजू हमें,
जब तूने भुलाया था बुरे ख्वाब की तरह !

तू खुश रहे अपने फलक में आफताब बन,
हम भी सुकूँ से हैं ज़मीं पे ख़ाक की तरह !
bahut hi lajabab sher.padhker maja aa gaya.bahut hi achchi gajal likhi aapne bahut bahut badhaai aapko.


please visit my blog and leave the comments also.thanks

ranjana said...

Sadhna ji...bahut sundar likha hai apne..yun hi likhti rahen...:)