मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, May 19, 2011

आरज़ू... नज़्म....डा श्याम गुप्त...

हमने चाहा कि आज,  खुद से मुलाक़ात करें |
भूल जाएँ आपको बस खुद से ही कुछ बात करें |

देख हमको आईने में, 
 अक्स ने ऐसे कहा |
आप अब कहाँ आप हैं,
उनके हुए जब आप हैं |

आपकी सूरत ही दिल-
 के, आईने में यूं ढली |
आप तो  हैं आप ही,
 और- होगये हम आप हैं |

हम भला तुम से मुखातिव हों या खुद से रूबरू ,
आईने में तुम हो,  मैं हूँ,  या है मेरी आरज़ू ||                 


3 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

हमने चाहा कि आज, खुद से मुलाक़ात करें |
भूल जाएँ आपको बस खुद से ही कुछ बात करें

Nice .

शारदा अरोरा said...

khoobsoorat ...bas shabdon ka her fer hai ...baat vahi sadiyon purani

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद अनवर जी---

--धन्यवाद शारदा जी ....जब आदि मानव से आज तक प्यार की भाषा परिभाषा नहीं बद्ली तो .... यह दुनिया एक मन्च है और व्यक्ति एक पात्र...जो बारी बारी से आकर वही नाटक दुहराते हैं...
---हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता---पर एको सद विप्रा: बहुधा वदन्ति...