मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, May 16, 2011

कुछ हट के सोचिये --ग़ज़ल ...डा श्याम गुप्त...

करना है कुछ बड़ा तो कुछ हट के सोचिये |
क्या कहेगा कोई हमें , बस यह न सोचिये 

हैं  और भी गम  ज़माने में  जीने  के लिए,
हम ही हैं बस इक ग़मज़दा खुद यह न सोचिये |

औरों ने जब किया नहीं तो हम भी क्यों करें ,
है बात व्यर्थ की सदा अब यह न सोचिये |

तप योग ध्यान साधना, वंदन भजन पूजन ,
दुष्कर हैं, करें कैसे, कब, यह  न सोचिये  |

हिम्मत करे उसका ही साथ देता है खुदा,
अपना नहीं है भाग्य 'श्याम यह न सोचिये ||

2 comments:

prerna argal said...

तप योग ध्यान साधना, वंदन भजन पूजन ,
दुष्कर हैं, करें कैसे, कब, यह न सोचिये |

हिम्मत करे उसका ही साथ देता है खुदा,
अपना नहीं है भाग्य 'श्याम यह न सोचिये ||bahut badhiyaa baat kahi aapne.itani achchi rachanaa ke liye bahut bahut badhaai aapko.

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद ..प्रेरणा जी...लीक से हट कर समाज -हित में सोचने वाले ही आगे बह पाते हैं...