मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, May 14, 2011

सुरभि...नज़्म..डा श्याम गुप्त...

तुम तो खुशबू हो फिजाओं में बिखर जाओगे ,
मैं तो वो फूल हूँ अंजाम है  मुरझा  जाना ||

मैं तो इक प्यास हूँ तुम कैसे समझ पाओगे,
बन के अहसास मेरे सीने में समाते जाना |

तुम तो झोंका हो हवाओं में लहर जाओगे,
टूटा पत्ता हूँ,   मुझे  दूर है  उड़ते  जाना |

बन के सौंधी सी महक, माटी को  महकाओगे,
मैं तो बरखा हूँ मुझे माटी में   है मिल जाना |

तुम तो बादल हो ज़माने में बरस जाते हो,
मैं हूँ बिजली मेरा अंजाम, तड़प गिर जाना |

तुम तो सागर हो ज़माना है तेरे कदमों में ,
मैं वो सरिता हूँ,  मुझे दूर है बहते जाना  |

तुम तो सहरा हो, ज़माना है तेरी नज़रों में,
सहरा की बदली हूँ, अंजाम है उड़ते जाना |

तुमने है ठीक  कहा,  मैं तो इक सहरा ठहरा ,
शुष्क और तप्त सी रेत का दरिया ठहरा |

मैं तो  सहरा हूँ ,  अंजाम है  तपते जाना,
तुम जो बदली हो तो इस दिल पे बरस के  जाना |

सहरा के सीने में भी मरुद्यान बसे होते  हैं, 
बन के हरियाली छटा उसमें ही तुम बस जाना |

तुमने है ठीक कहा, मैं तो हूँ सागर गहरा,
मेरा अंजाम किनारों से है बंध कर रहना |

तुम ये करना, मेरे दिल से मिलते  रहना ,
बन के दरिया मेरे सीने में समाते जाना |

हम जो बन खुशबू , फिजाओं में बिखर पायेंगे,
फूल हो तुम तो ज़माने में सुरभि बिखराना ||



सहरा =रेगिस्तान ,   फिजां = मौसम ,  अंजाम = परिणाम 



      


1 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

भावपूर्ण सुंदर रचना के लिए बधाई ।