मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, May 12, 2011

अब रोशनी में भी कुछ नज़र नहीं आता



अब रोशनी में भी
कुछ नज़र नहीं आता
सारा जहां अँधेरे से
ढका लगता
वो रुखसत जहाँ से  हुए
खामोश मेरी दुनिया को
कर गए
हवा का रुख अचानक
बदल गया
उड़ते उड़ते ज़मीं पर
आ गया
निरंतर हंसता गाता चेहरा
अश्कों से तर बतर
हो गया
हर लम्हा उनका
अहदे-वफ़ा याद आया
उनकी याद ने दिल छलनी
कर दिया
जीने का मकसद नेस्तनाबूद 
कर दिया
12-05-2011
844-51-05-11
 (अहदे-वफ़ा= वफ़ादारी का प्रण)

1 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

खूबसूरत अल्फाज़ के साथ बेहतरीन नज़्म!