मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, May 10, 2011

एक त्रिपदा अगीत गज़ल... डा श्याम गुप्त.....

            उलझे
(  त्रिपदा अगीत के  तीन-तीन पद वाली गज़ल---प्रथम शे’र के तीनों पदों में वही अन्त्यानुप्रास , शेष में अन्तिम पद में वही अन्त्यानुप्रास)

क्यों पागल दिल हर पल उलझे,
जाने क्या क्यों ज़िद में उलझे;
क्यों   एसे   पागल से    उलझे ।

तरह तरह से समझा देखा,
पर दिल है उलझा जाता है ;
सुलझा कभी, कभी फ़िर उलझे ।

धडकन बढती जाती दिल की,
कहता बातें किसिम किसिम की;
ज्यों  कांटों में आंचल उलझे ॥

1 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत अभिव्यक्ति