मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, May 8, 2011

होशियार रहना.....गज़ल...डा श्याम गुप्त....



इस शहर में आगये होशियार रहना |
यह शहर है यार कुछ होशियार रहना |

इस शहर में घूमते हैं हर तरफ ही,
मौत के साए तुम होशियार रहना |

घूमते  हैं  खट  खटाते  अर्गलायें,
खोलना मत द्वार बस होशियार रहना |

एक दर्ज़न श्वान थे और चार चौकीदार,
हो गया है क़त्ल  अब होशियार रहना  |

अब न बागों में चहल कदमी को जाना,
हो रहा व्यभिचार  तुम होशियार रहना |

सज संवर के अब न  जाना साथ उनके,
खींच  लेते  हार  सब  होशियार रहना |

चोर की करने शिकायत आप थाने जारहे,
पी चुके  सब चाय अब  होशियार रहना |

क्षत- विक्षत जो लाश चौराहे पर मिली ,
काम आदम खोर सा होशियार रहना |

वह   नहीं   था बाघ आदमखोर यारो,
आदमी था श्याम, तुम होशियार रहना ||

3 comments:

शालिनी कौशिक said...

वह नहीं था बाघ आदमखोर यारो,
आदमी था श्याम, तुम होशियार रहना ||
sahi kaha shayam ji aapne.

karne chale ho agar mushayera me tippani ,
gazal ho shyam ji ki to hoshiyar rahna.

veerubhai said...

वो नहीं था बाघ आदमखोर यारों ,
आदमी था ,श्याम तुम होश्यार रहना ।
ये शहर है तुम जरा होश्यार रहना ।
कुछ न सुनना ,कुछ न कहना ,
बा -खबर होश्यार रहाना ,
श्याम तुम होश्यार रहना .

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शालिनी जी व वीरूभाई...
आदमी के वेश में घूमते हैं बाघ भी,
देखना सुनना जरा होशियार रहना ॥