मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, May 4, 2011

मेरी डायरी से मीना कुमारी जी का आखिरी पन्ना

या नूर कैसा है,राख का सरन पहने
बर्फ की लाश का दरिया है,लावा का सा बदन पहने
गूंगी चाहत है ,रुसवाई का कफ़न पहने

ये कैसा शोर है जो बे आवाज़ फैला है 
रुपहली चाहों में बदनामियों का डेरा है
एहसास-ए-बेक़रां पे ये सरहद कैसी

दरों दीवार कहाँ ,रूह की आवारगी है 
हर एक मोड़ पे बस दो ही नाम मिलते हैं
मौत कहलो जो ,मोहब्बत न कहने पाओ.

राह देखा करेगी सदियों तक 
        छोड़ जायेंगे ये जहाँ तनहा.

प्रस्तुति-शालिनी कौशिक 

3 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

Nice poetry.

शिखा कौशिक said...

khoobsurat meena ji ki lajawab shayree .aabhar itni sundar prastuti ke liye .

दर्शन कौर धनोए said...

हाय मीना तेरा जबाब नही ...

"चाँद तन्हा है आसमा तनहा
दिल मिला है कहाँ -कहाँ तनहा
जिन्दगी क्या इसी को कहते है
जिस्म तनहा है और जा तन्हा "
- मीना