मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, April 28, 2011

मंज़िल का कुछ सुराग़ नहीं Shayri


इंसानियत को क़त्ल तो खुद कर रहे हैं लोग
इल्ज़ाम दूसरों पे मगर धर रहे हैं लोग
मंज़िल का कुछ सुराग़ नहीं, क़ाफ़िला नहीं
तारीकियों में फिर भी सफ़र कर रहे हैं लोग

          -असद रज़ा

यह बंद आज उर्दू अख़बार राष्ट्रीय सहारा में पढ़ा और अच्छा लगा तो इसे आपके लिए यहां ले आया। इसी कॉलम के ऊपर कुछ नसीहतें भी लिखी हैं। ये भी मुफ़ीद मालूम हुईं। इन्हें आप अपनी कविता के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाएं तो अच्छा रहेगा।
1. एक अंधा अगर दूसरे अंधे को रास्ता बताएगा तो दोनों ग़ार में गिरेंगे।
2. तीन चीज़ों से आदमी को दुनिया में मुश्किल पेश आती है, बीमारी, तवंगरी (समृद्धि) और बेख़ौफ़ी।
3. तीन चीज़ों से ज़िंदगी आराम से गुज़रती है, सेहत, तवंगरी और बेख़ौफ़ी।
4. खुशामद करने वाला और उसे सुनकर ख़ामोश रहने वाला, दोनों कमीने हैं और दोनों एक दूसरे को धोखा देते हैं।

17 comments:

शालिनी कौशिक said...

anwar jamal ji,
aapki prastuti ne vastav me insaniyat par aa rahe bure samay ko bahut gambheerta se vyakt kiya hai.asad raja ji ko hamari shubhkamnayen preshit keejiyega.
ek aur prathna hai aapse ki aapne post prakashit karne ka to samay nishchit kar diya hai ek kam aur keejiyega ki ek saptah me ek yogdankarta kitni post dal sakta hai kyonki ye dekhne me aa raha hai ki ek hi yogdan karta lagatar post dal dete hain aur is karan doosre yogdan karta ko apni post prakashit karne se ruk jana padta hai.
yadi mere is sujhav se sabhi sahmat hon tabhi aap aisa keejiyega kyonki kisi ko thes pahunchane ka mera koi irada nahi hai.

शिखा कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

DR. ANWER JAMAL said...

@शालिनी कौशिक जी ! असद रज़ा जी को शुक्रिया आप खुद कहें तो उन्हें ज़्यादा खुशी होगी।
asadrnaqvi@yahoo.co.in
unhe link bhi de dijiyega.

आप अपनी रचनाएं लगातार डालिए, डाक्टर साहब अपना खुद देख लेंगे। थोड़े दिन में लोग सब समझ जाएंगे कि कब मौक़ा है ? और कब डालनी है ?
लोग इतने सीधे नहीं हैं यहां कि अपना हक़ मर जाने देंगे ।
हा हा हा
और आपका हक़ हमारे रहते मरने नहीं पाएगा।
इसके बावजूद सद्र मोहतरम इस विषय में ग़ौर करेंगे।

डा. श्याम गुप्त said...

---सुधार--

---2. तीन चीज़ों से आदमी को दुनिया में मुश्किल पेश आती है, (बीमारी ?), तवंगरी (समृद्धि) और बेख़ौफ़ी।---यदि स्वार्थ रत, सिर्फ़ अपने लिये हो तो....


3. तीन चीज़ों से ज़िंदगी आराम से गुज़रती है, सेहत, तवंगरी और बेख़ौफ़ी---यदि परमार्थ रत भाव हो तो...

डा. श्याम गुप्त said...

सीधे सीधे दिन में एक शायर एक पोस्ट डाले--चाहे जब डाले..

डा. श्याम गुप्त said...

---खुशामद करने वाला और उसे सुनकर ख़ामोश रहने वाला, दोनों कमीने हैं और दोनों एक दूसरे को धोखा देते हैं।---सही..

"----शालिनी जी की शायरी तो सुनकर मुर्दे भी अंगड़ाइयां लेने लगेंगे---"
--अब इस खुशामद पर बोला जाय या चुप रहा जाय....

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय डा. श्याम जी !
1. पहले कमेंट को सुधार नहीं विस्तार कहा जाएगा।

2. दूसरे प्रस्ताव का इंकार किया जाएगा । मान लीजिए किसी 'न मैं कवि और न मैं शायर' ने यहाँ कुछ लिख डाला तो फिर पाठकों की गर्दन तो 24 घंटों के लिए फंस ही जाएगी न ?
हमारा दर्शन मुक्ति की राह दिखाता है ।

3. तारीफ़ तो हम आपकी भी करते हैं , तब आप क्यों चुप रहते हैं ?
हा हा हा
वाह , आप अपनी तरह के बस एक ही हैं ।

डा. श्याम गुप्त said...

----विस्तार, सुधार के लिये ही तो किया जाता है.....

----२४ घंटे में एक ही पोस्ट थोडे ही डाली जानी है...प्रत्येक शायर एक दिन में एक ही पोस्ट डाले....पोस्ट चाहे जितनी हो जायं एक दिन में...

----तारीफ़ और खुशामद में फ़र्ख होता है...और सभी अपनी तरह के एक ही होते हैं...

DR. ANWER JAMAL said...

विस्तार कभी सुधार के लिए होता है और कभी व्याख्या के लिए ।
दर्शन सूत्रों की व्याख्या की जाती है तो उस व्याख्या को सुधार नहीं माना जाता ।

एक दिन में एक पोस्ट का आपका विचार अच्छा है लेकिन 8 घंटे के अंतराल वाला भी अच्छा है ।
जल्दी ही सद्र मोहतरम इस विषय पर एक पोस्ट बनाएंगे तब इन सभी सुझावों को हम उनके सामने रखेंगे कमेंट के रूप में ।

आप हमारे शब्दों को अपने लिए तारीफ़ क़रार देते हैं तो शालिनि जी के लिये भी मेरे शब्दों को तारीफ़ ही समझ लीजिए ।
अतिश्योक्ति अलंकार नामक कोई चीज़ साहित्य में आपकी नज़र से गुज़री है या नहीं , थोड़ा Ibu Para से निकलकर सोचिए न ?

डा. श्याम गुप्त said...

--व्याख्या में कुछ नया नहीं जोडा जाता ,सिर्फ़ अर्थ स्पष्ट किय जाता है...

--अतिशयोक्ति...खुशामद का ही अलन्कार है....

Dr. Ayaz Ahmad said...

वाह क्या कमाल का ब्लाग है

शालिनी कौशिक said...

dr sahab aapke kahe anusar asad ji ko badhai preshit kar dee hai .

DR. ANWER JAMAL said...

@ डाक्टर श्याम जी ! देखिये यह आर्टिकल और जानिये कि
'खुशामद वास्तव में घृणा का एक स्वरूप है। आपकी खुशामद करने वाला व्यक्ति वह है, जो आपसे डरता है या आपसे ईष्र्या करता है।
शायद वह आपसे इतना पीछे है कि वह खुशामद की हवा पर सवार होकर आप तक पहुंचना चाहता है। लेकिन खुशामद के खतरों के प्रति सजग होने के बावजूद हमें वास्तविक सराहना जारी रखनी चाहिए। ईमानदारी से की गई सराहना तोहफों की तरह होती है। तोहफों को सहेजकर नहीं रखा जाता।'

और अब बताइये कि क्या हमें शालिनी जी से किसी भी तरह की कोई नफरत है ?

'तारीफ़ और खुशामद में फ़र्क़' Praise

DR. ANWER JAMAL said...

@ शालिनी जी ! आपका शुक्रिया .
आप भी लेख पढ़ें और शिखा जी को भी पढ़वाएं और टिप्पणी भी ज़रूर दें ताकि डाक्टर साहब को ज्ञान मिले .

shanno said...

बहुत अच्छा लिखा है....

डा. श्याम गुप्त said...

अनवर जी---लेखक एक प्रशासक, राजनयिक व राज्यपाल हैं--- कोई स्थापित साहित्य्कार , शास्त्रकार , विद्वान या मनोवैग्यानिक नही हैं---वैसे भी राजनयिक लोग प्रायः विग्य व विद्वान नही होते...काम चलाऊ होते हैं...उनके आलेख आदि उनके पद के कारण प्रकाशित होते हैं..
----दिये गये तथ्य गलत ही हैं.....
१--खुशामद करने वाला अपसे घ्रणा नहीं..हां ईष्या कर सकता है ,पर मूल में आपसे कुछ लाभ हासिल करने का भाव होता है,--जो आलेख पर दी गयी सभी टिप्पणियों से ज़ाहिर होता है.. खुशामद में प्रति-सराहना की इच्छा भी शामिल है, जो बिना किसी वस्तुकारक लाभ के भी होती है,।...प्रशंसा में अतिशयोक्ति पूर्ण कथन नहीं होता... यही प्रशंसा व खुशामद में अन्तर है...
२-"तोहफों को सहेजकर नहीं रखा जाता। "---क्या यह मूर्खतापूर्ण बयान नहीं है....तोहफ़े को तो सभी सहेज़ कर रखते है क्योकि वे इसीलिये होते हैं...अन्यथा तोहफ़े देने वाले की बेइज़्ज़ती होती है...

Shah Nawaz said...

असद राजा साहब के कलाम से रु-बरु करवाने के लिए शुक्रिया!