मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, April 20, 2011

हम खुश हैं कि हमें सद्र मोहतरम जनाब डा. रूपचंद शास्त्री ‘मयंक‘ जी के रूप में एक होशमंद दानिश्वर मिला जो हमारा साथी भी है और हमारा बुज़ुर्ग भी The President

जनाब डा. रूपचंद शास्त्री ‘मयंक‘ जी को ‘मुशायरे‘ का सद्र मुन्तख़ब किया गया है, यह बात मुशायरे में शामिल अफ़राद आज बख़ूबी जान ही चुके हैं। उनकी शख्सियत किसी तआर्रूफ़ की मोहताज नहीं है। मयंक जी हिंदी-संस्कृत के जानकार हैं। कवि हैं, साहित्यकार हैं, पत्रकार हैं और आर्थिक-सामाजिक दौड़ में पिछड़ गए लोगों के मददगार हैं, ग़रीबों के ग़मगुसार हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि वे नर्म और मिलनसार हैं। मयंक जी बहुत सी किताबों के लेखक हैं। राजनीति के धुरंधरों और सिकंदरों से उनकी काफ़ी क़रीबी जान-पहचान है। उनमें ऐसी बहुत सी खूबियां हैं, जिन्हें देखकर लोग उनकी तरफ़ माएल होते हैं। जनाब अख्तर खान साहब ने उनकी खूबियों का एक मुख्तसर सा ख़ाका अभी हाल ही में ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर पेश भी किया था।

इस ‘मुशायरे‘ में जिन 36 शायरों और कवियों को निमंत्रित किया गया था, उनमें सबसे पहले तशरीफ़ लाने वाले भी जनाब मयंक जी ही हैं। मैं भी मयंक जी का क़ायल हूं लेकिन मुझे उनकी जिस सिफ़त ने क़ायल किया, वह बिल्कुल एक दूसरी ही सिफ़त है। बहुत लोग जानते हैं कि वे अपनी शरीके-हयात की बड़ी क़द्र करते हैं लेकिन कम लोग हैं जो यह जानते हैं कि वे अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के बिल्कुल शुरूआती दौर में आज जैसे नहीं थे। समय से उन्होंने सीखा और अपनी शरीके-हयात को उन्होंने वह सम्मान दिया जो कि एक पत्नी को वास्तव में मिलना चाहिए, मैं किसी इंसान की पहचान इसी बात से करता हूं कि वह अपनी पत्नी, अपनी बेटी, अपनी बहन, अपनी मां और एक औरत के साथ कैसा बर्ताव करता है ?

अगर वह उनके साथ अच्छा बर्ताव करता है तो यक़ीनन वह एक अच्छा इंसान है। वह औरत को सम्मान देते हैं, इसीलिए मैं उनका सम्मान करता हूं। इसी खूबी की वजह से उन्हें मुशायरे का सद्र मुन्तख़ब किया गया है। उनकी इस खूबी को हम सभी को सीखना चाहिए। वे अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां उनकी खूबियों को नई नस्ल में ट्रासफ़र होना है ताकि हमारे समाज में खूबियों का प्रवाह अविरल बहता रहे। मन की शांति और समाज के विकास में दाम्पत्य जीवन की सफ़लता की ख़ास अहमियत है। इसी नाज़ुक रिश्ते के अहसास को अल्फ़ाज़ दिए जाते हैं तो शायरी वुजूद में आती है।

शायर इकठ्ठे होते हैं तो ‘मुशायरा‘ वुजूद में आता है। लोग क़रीब आते हैं तो दूरियां घट जाती हैं और जब एक-दूसरे का हाले-दिल सुनते हैं तो पता यही चलता है कि नफ़रतें बेबुनियाद हैं। इस महफ़िले-मुशायरे का मक़सद भी यही है।

मैं इस मुशायरे का संयोजक और प्रबंधक हूं। इस ब्लॉग की सजावट आदि की ज़िम्मेदारी मुझ पर है। मैं हमेशा नियम बनाने से परहेज़ करता हूं ताकि रचनाकारों को ज़्यादा से ज़्यादा आज़ादी हासिल हो सके। वे जो कहना चाहें कह सकें, वे जो करना चाहें, कर सकें। सभी बुद्धिजीवी हैं, सामान्य शिष्टाचार सभी जानते हैं और सभी निभाते भी हैं। इस मुशायरे में शामिल कई साथी मेरे साथ दूसरे कई मंचों पर भी मौजूद हैं और हम सभी एक दूसरे के साथ खुश हैं। इस मंच पर कुछ नए साथी भी जुड़े हैं, उनका साथ पाकर हम सभी की खुशी में और भी ज़्यादा इज़ाफ़ा हुआ।

जब हम लोग समूह में होते हैं तो कुछ जटिलताएं भी सामने आती हैं। सभी के उम्र, मिज़ाज, उसूल और माहौल में अंतर होता है। उनकी धार्मिक-सामाजिक परंपराओं में भी कुछ न कुछ अंतर होता है। इस अंतर की वजह से आपस में कुछ असहमतियां भी होती हैं। तमाम असहमतियों के बावजूद हम सभी समाज में एक साथ शांतिपूर्वक रहते हैं। ठीक ऐसे ही हमें इस ब्लॉग जगत में भी रहना चाहिए और ख़ास तौर पर ‘मुशायरे‘ में, क्योंकि यह अदब की महफ़िल है और इसमें शामिल सभी फ़नकार संवेदनशील हैं। अगर आपको किसी की कोई बात नागवार गुज़रती है तो आप उसे नज़रअंदाज़ कर दीजिए या फिर अपनी असहमति जता दीजिए। इससे ज़्यादा कुछ कहना ठीक नहीं है। किसी से कोई भूल हो जाए तो आप उसे माफ़ कर दीजिए, बिना उसके माफ़ी मांगे ही और जब वह माफ़ी मांगे तब तो ज़रूर ही उसे माफ़ कर दीजिए। हम यहां जुड़े हैं तो टूटने के लिए नहीं जुड़े हैं बल्कि जोड़ने के लिए जुड़े हैं।

साहित्य को हमें मात्र पढ़ना ही नहीं है बल्कि उसे बेहतर अर्थों में अपने अंदर भी समाना है। जो भी नेक प्रेरणा हमें यहां मिले, उसे हम अपने अमल में लाएं। अगर हम ऐसा नहीं करते तो हम शायर का भी वक़्त ख़राब करते हैं और अपना भी। साहित्य मात्र शब्दजाल नहीं होता है। वह एक सांचा होता है जिसमें हमें ढलना होता है, वह एक आईना होता है जिसे देखकर हमें खुद को निखारना होता है। एक एक करके हमारे अंदर अच्छे गुण बढ़ते जाएं, इस ‘मुशायरे‘ का मक़सद यही है।

इसी मक़सद की पूर्ति के लिए सद्र मोहतरम ने एक नियम तो यह बनाया है कि जब एक रचनाकार अपनी पोस्ट इस ब्लॉग पर लगाए तो दूसरे रचनाकार ताबड़-तोड़ दूसरी पोस्ट न लगाकर उसे पढ़ें, उस पर मनन करें और अपनी पोस्ट 8 घंटे बाद लगाएं। थोड़ी-बहुत आगे-पीछे भी भूलवश हो जाए तो कोई बात नहीं लेकिन अपनी तरफ़ से पूरी एहतियात की जाए। इसका लाभ सभी रचनाकारों को मिलेगा। यह एक अच्छा नियम है। मैं भी इसका पालन करूंगा लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरी पोस्ट के विषय में आप लोग बरी रहें। मेरे पोस्ट लगाने के बाद आप लोग कितनी भी देर बाद पोस्ट लगा सकते हैं और अगर ऐसे ही कोई और भी स्वेच्छा से इजाज़त देना चाहे तो उसे भी अनुमति होनी चाहिए लेकिन यह केवल एक प्रस्ताव है, इसे सद्र मोहतरम की मंज़ूरी मिलनी शेष है। समय-समय पर सद्र मोहतरम जो भी क़ायदा और ज़ाब्ता बताएं, उसका लिहाज़ हमें रखना होगा। आप और हम उन्हें राय दे सकते हैं, विनती कर सकते हैं लेकिन जिस चीज़ को वह फ़ाइनल कर देंगे, वह फ़ाइनल ही मानी जाएगी। सद्र का मक़ाम और उसका तक़ाज़ा यही होता है। हमें विश्वास है कि वे जो भी फ़ैसला लेंगे, सामूहिक हित में ही लेंगे और उसका फ़ायदा हम सभी को मिलेगा। उनकी प्रतिभा और कार्यकुशलता में कोई शुब्हा किसी को भी नहीं है।

हम खुश हैं कि हमें एक होशमंद दानिश्वर मिला जो हमारा साथी भी है और हमारा बुज़ुर्ग भी। ऐसे लोग आज कम हैं और उनकी सोहबत हमारे लिए तरबियत का उम्दा सामान है।

अपने सद्र मोहतरम का हम ख़ैर मक़दम और स्वागत करते हैं।

इसी के साथ हम आपको यह भी बताना चाहते हैं कि अगर आपको मुशायरे से या मुशायरे से जुड़े साथियों से या फिर अपनी रचना से जुड़ी कोई बात कहनी है तो आप उसे अपनी रचना के साथ गद्य में भी कह सकते हैं और टिप्पणियों में तो आप बहरहाल कहेंगे ही।

अब हम जनाब सद्र मोहतरम से दरख्वास्त करेंगे कि एक पोस्ट के माध्यम से वह भी अपने ख़यालात का इज़्हार करें और बताएं कि वह इस समूह के लिए क्या सोचते हैं और हमें किन बातों का ख़ास ख़याल रखना होगा ताकि आपस में हम सभी का ताल्लुक़ देरपा और स्थायी हो सके।

शुक्रिया !

-मुन्तज़िर::: डॉ अनवर जमाल 'ख़ान' 

12 comments:

Kunal Verma said...

शास्त्री जी को अध्यक्ष के रुप मेँ पाकर मुझे बहुत ही खुशी हुई।मैँ यह विश्वास दिलाता हुँ कि उनके द्वारा बनाए गए किसी भी नियम का सख्ती से पालन किया जाएगा।

-कुणाल वर्मा

एक बार जरुर आएँ:
http://shabdshringaar.blogspot.com

शिखा कौशिक said...

shastri ji ko mushayera ka sadr niyukt kiye jane par hardik shubhkamnaye .

शालिनी कौशिक said...

anvar jamal ji shayad zindgi ka sabse behtar karya aapne yahi kiya hai.sahi hathon me blog kee kaman saunp dee hai.aur aap kaise iske niyamon se alag ho sakte hain aapko bhi inme hi bandhna hoga aur yadi kisi aur ke bad agli post me samay lagega to aapki post ko bhi ye samman diya jayega.shastri ji ko bahut bahut badhai.

Neelam said...

shastri ji ko mushayera ka sadr niyukt kiye jane par meri hardik shubhkamnaye .

वन्दना said...

शास्त्री जी की खूबियाँ ही उन्हे दूसरों से अलग करती हैं……………शास्त्री जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

सदा said...

आदरणीय शास्‍त्री जी ब्‍लाग जगत में किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं आपकी खूबियों से कुछ हद तक तो परिचित थी ... बाकी की कमी आज आपने पूरी कर दी और आपको अध्‍यक्ष के रूप में पाकर बहुत ही खुशी हुई... जिसके लिये आपको बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं ।

Sadhana Vaid said...

बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें !

डा. श्याम गुप्त said...

shaastreejee ko badhaaee ...

shanno said...

शाष्त्री जी, मुशायरे का अध्यक्ष नियुक्त किये जाने के उपलक्ष्य में मेरी तरफ से भी बधाई स्वीकार कीजिये. आपका लेख बहुत अच्छा लगा पढ़कर. इसके नियम व आपकी सलाह को हम निभाने की कोशिश जरूर करेंगे. शुक्रिया.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आप सबका स्नेह और प्यार पाकर अभिभूत हूँ!

सलीम ख़ान said...

great

badhaaee !

Kuldeep Thakur said...


सुंदर प्रस्तुति...
मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 28-06-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।
जय हिंद जय भारत...
मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...