मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, April 24, 2011

ग़ज़लें Ghazal



                             1
वक्त से पहले चराग़ों को जलाते क्यों हो
ऐसी तस्वीर ज़माने को दिखाते क्यों हो

मुझसे मिलने के लिए आते हो आओ लेकिन
मुझको भूले हुए दिन याद दिलाते क्यों हो

ले के उड़ जाएंगी इस को भी हवाएं अबके
अपनी तस्वीर से दीवार सजाते क्यों हो

तुमको यह दुनिया उदासी के सिवा क्या देगी
बेवफ़ा दुनिया से दिल लगाते क्यों हो

भूल बैठे हो क्या पुरखों का आदर्श
अपने ही भाई का तुम खून बहाते क्यों हो

शकील अहमद फरेंक , गोरखपुर
मियां साहब इस्लामिया इंटर कॉलिज
गोरखपुर (उ. प्र.)
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                          2
जो चश्मो लब का ज़िक्र हो नज़ाकतों की बात कर
किसी से छेड़छाड़ है शरारतों की बात कर

हमारे मुन्सिफ़ों ने दी यज़ीदे वक्त को अमां
है बेगुनाह दार पर अदालतों की बात कर

चले हैं मुफ़लिसों के घर वज़ीर वोट मांगने
ग़रीब की फ़क़ीर की सख़ावतों की बात कर

नगर-नगर को लूट कर अमीरे शहर चल दिया
अमानतों का ज़िक्र क्या ख़यानतों की बात कर

हरेक ज़रपरस्त को न ऐसे आईना दिखा
है ‘शाकिर‘ नवाए जंग अमारतों की बात कर

रफ़ीक़ शाकिर
हाजी नगर, अकोट फ़ाइल, अकोला-444003
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भाई खुशदीप सहगल जी ने हमें नेक नसीहत का एक तोहफ़ा दिया है और उन्होंने अपनी पोस्ट में हमारा नाम भी लिया है। नेकी का बदला नेकी है और अहसान का बदला अहसान के सिवा क्या है ?
कोई आदमी आपको भलाई से याद करे और आपको भली बात कहे, यह चलन पहले तो आम था लेकिन आज की मसरूफ़ ज़िंदगी में यह नायाब है। नेकी और भलाई का बदला नेकी और भलाई से ही दिया जाना चाहिए और पठान किसी का अहसान न तो भूलता है और न ही उसे उतारने में देर ही करता है। लिहाज़ा इन खूबसूरत ग़ज़लों को हम भाई खुशदीप जी की नज़्र करते हैं।
इन लिंक्स पर भी आप नज़र डाल लेंगे तो बंदा आपका शुक्रगुज़ार होगा और साथ ही भाई खुशदीप जी से हमारे मुकालमे का पसमंज़र भी आपके सामने आ जाएगा।
शुक्रिया !
1- अगर किसी को बड़ा ब्लॉगर बनना है तो क्या उसे औरत की अक्ल से सोचना चाहिए ? Hindi Blogging
2- कैसा होता है एक बड़े ब्लॉगर का वैवाहिक जीवन ? Family Life

8 comments:

डा. श्याम गुप्त said...

--सुन्दर गज़लें...बहुत खूब...

DR. ANWER JAMAL said...

आदरणीय डा. श्याम गुप्ता जी ! पसंद करने के लिए आपका शुक्रिया।

shanno said...

दोनों गजलें बहुत लाजबाब....

Kunwar Kusumesh said...

वक्त से पहले चराग़ों को जलाते क्यों हो
ऐसी तस्वीर ज़माने को दिखाते क्यों हो

ग़ज़ल का मत्ला पढ़कर मुझे अपने दोस्त शायर गुलरेज़ इलाहाबादी का एक शेर याद आ गया जो बड़ा मौजूं है.देखिये आप भी:-
क़दम क़दम में मरासिम निभाये जाते हैं.
चराग़ ख़ुद नहीं जलते जलाये जाते है.
शेर की खूबी होती है की वह पढ़ते ही दिमाग़ पर चस्पा हो जाये.
वास्तव में शायर नहीं बोलता है ,शायर का फ़न बोलता है.

DR. ANWER JAMAL said...

क़दम क़दम में मरासिम निभाये जाते हैं.
चराग़ ख़ुद नहीं जलते जलाये जाते है.

@जनाब कुंवर कुसुमेश जी ! वाक़ई आपने बहुत उम्दा शेर सुनाया है और यह भी आपने सच ही कहा कि
'शेर की खूबी होती है कि वह पढ़ते ही दिमाग़ पर चस्पा हो जाये.
वास्तव में शायर नहीं बोलता है ,शायर का फ़न बोलता है.'
शुक्रिया।

Kunal Verma said...

बेहद उम्दा

Kunwar Kusumesh said...

मेरे कमेन्ट में कोट किये गए शेर में "पे" की जगह "में" टाइप हो गया गल्ती से.वो शेर यूँ है.
क़दम क़दम पे मरासिम निभाये जाते हैं.
चराग़ ख़ुद नहीं जलते जलाये जाते है.
sorry for the mistake which has crept unknowingly.

DR. ANWER JAMAL said...

@ जनाब कुंवर साहब ! यह अच्छा लगा कि हमें शेर बिल्कुल अस्ल हालत में मिल गया। हक़ीक़त यह है कि बहुत सी चीज़ें गूगल टूल में लिखते हुए या कमेंट देते हुए ज़हन में नहीं रह पातीं और मात्राओं की ग़लतियां हो जाती हैं। यह भी एक ऐसी ही ग़लती थी लेकिन क्या कीजिए कि जो अपने फ़न में माहिर होते हैं वे उन ग़लतियों की निशानदेही करके नए सीखने वालों को भ्रम से बचा लेते हैं।
शुक्रिया।