मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, April 22, 2011

खतौली में मुशायरे का आयोजन


यह मुशायरा टीम इंडिया की फ़तह के मौक़े पर आयोजित किया गया था, जिसकी सदारत सदाक़त देवबंदी ने की। इसी मुशायरे से कुछ चुनिंदा शेर पेश ए खि़दमत हैं-

अभी हाथ ही मिला है, अभी दिल कहां मिले हैं
अभी और पास आओ, अभी फ़ासला बहुत है
                      सदाक़त देवबंदी

कभी वो दौर था हासिल नहीं था क़तरा भी
अब उंगलियों पर समंदर नचा रहा हूं मैं
                    सलीम अहमद सलीम

जाने किस किस को अनागीर समझ रखा है
तुमने तिनकों को शहतीर समझ रखा है
                   जमाल हाशमी

ख्वाहिशात के बन कर सदा असीर रहे
जो बेज़मीर थे, वो लोग बेज़मीर रहे
               आदिल कामरान आदिल

कहां तक आ गये हम आज खुदपरस्ती में
बसेरा कर लिया दहशत ने दिल की बस्ती में
               अब्दुल हक़ ‘सहर‘

बीवी को कोतवाल की देखा था मैंने बस
थाने में पिटना रोज़ का दस्तूर हो गया
               राहत मंगलौरी  

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

खतौली में सम्पन्न मुशायरे के उम्दा शेरों को साझा करने के लिए शुक्रिया!

डा. श्याम गुप्त said...

थाने में पिटना रोज़ का दस्तूर हो गया--- वाह क्या दस्तूर है...