मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 16, 2011

हवा के साथ

हवा के साथ यह कैसा मुआमला हुआ है

बुझा चुका था जिसे वह दिया जला हुआ है

हुजुर आप कोई फैसला करेँ तो सही

हैँ सर झुके हुए दरबार भी लगा हुआ है

खडे हैँ सामने कब से मगर नहीँ पढते

वह एक लफ़्ज़ जो दीवार पर लिखा हुआ है

है किसका अक्स जो देखा है आइने से अलग

यह कैसा नक़्श है जो रूह पर बना हुआ है

यह किसका ख्वाब है ताबीर के तअकुब मेँ

यह कैसा अश्क है जो खाक मेँ मिला हुआ है

यह किसकी याद की बारिश मेँ भीगता है बदन

यह कैसा फूल सरे शाख़े-जां खिला हुआ है

सितारा टूटते देखा तो डर गया था मैँ

ख़बर न थी यही तक़दीर मेँ लिखा हुआ है

-कुणाल वर्मा

http://shabdshringaar.blogspot.com ब्लॉग से लिया गया है।

3 comments:

POOJA... said...

वाह... आज पहली बार आई हूँ... क्या खूब महफ़िल जमी है...
बहतु खूब...

DR. ANWER JAMAL said...

अच्छी रचना .
@ पूजा जी , तशरीफ़ आवरी का शुक्रिया.

डा. श्याम गुप्त said...

बहुत सुन्दर पूजा जी...