मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 16, 2011

एतबार न कर....डा श्याम गुप्त की नज़्म....

ए मेरे दिल तू यूंही गैर पे ऐतवार न कर |
प्यार को समझे न जो तू उसे प्यार न कर ||....ऐ मेरे दिल....

गैर तो गैर हैं अपनों का भी एतवार कहाँ ,
ढूँढता क्या है जहां में अब एतवार कहाँ |

अपने एतवार पे भी ऐ दिल ऐतवार न कर ,
इश्क को समझे न वो, इश्के इजहार न कर ||  ...ऐ मेरे दिल...

उनपे ऐतवार किया उनका करम देख लिया ,
इश्के इज़हार किया इश्के भरम देख लिया |

श्याम’ तू एसी खता अब तो हर बार न कर ,
प्यार को समझे न वो इश्के इकरार  न कर ||  ...ऐ मेरे दिल ...
 
इश्के इकरार या इनकार खुदा की रहमत,
कैसे कह दूं कि खुदा पे भी तू एतवार न कर ||  ...ऐ मेरे दिल....||

7 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

अच्छी रचना .
तशरीफ़ आवरी का शुक्रिया.

सारा सच said...

अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (18-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

udaya veer singh said...

sunder gazal rachana ke liye badhayiyan
achha prayas .

Vivek Jain said...

bahut badhiya
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

बाबुषा said...

kya baat hai ! barhia !

डा. श्याम गुप्त said...

बाबुषा, विवेक,उदय वीर, सारा जी, जमाल जी व वन्दना जी सभी को शुक्रिया...