मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 23, 2011

गज़ल की गज़ल...२..डा श्याम गुप्त...


शेर मतले का रहे  ,तो ग़ज़ल होती है ।
शेर मक्ते का रहे,  तो ग़ज़ल होती है ।

रदीफ़ और काफिया रहे ,तो ग़ज़ल होती है ,
बहर हो सुर ताल लयहो ,वो ग़ज़ल होती है।

पाँच से ज्यादा हों शेर ,तो ग़ज़ल होती है ,
बात खाशो-आम की हो ,वो ग़ज़ल होती है।

ग़ज़ल की क्या बात यारो ,वो तो ग़ज़ल होती है ,
ग़ज़ल की हो बात जिसमें ,वो ग़ज़ल होती है।

ग़ज़ल कहने का भी इक अंदाजे ख़ास होता है,
कहने का अंदाज़ जुदा हो तो ग़ज़ल होती है।

ग़ज़ल तो बस इक अंदाजे-बयाँ है श्याम ,
श्याम’ तो जो कहदें, वो ग़ज़ल होती है॥

5 comments:

Kunal Verma said...

माशाल्लाह।मजा आ गया

DR. ANWER JAMAL said...

यूँ तो हर बात आपकी ग़ज़ल होती है
वर्ना महबूब से बातें ही ग़ज़ल होती है

उर्दू न जानने वालों के लिए अर्ज़ है कि ग़ज़ल का अर्थ है 'महबूब से बातें करना'। बाद में दीगर विषय भी ग़ज़ल में उठाए जाने लगे और अब तो डा. श्याम गुप्ता जी जैसे भाई भी इसमें हाथ आज़माने लगे जो कि कहते हैं कि न मैं कवि हूँ और न ही शायर ।
बड़ी विकट स्थिति है ।

आज का लतीफ़ा
आज मैंने ड्राफ़्ट में पड़ी अपनी पोस्ट को पब्लिश की कमाँड दी तो वह कल की तारीख़ में ही पब्लिश हो गई। जब तक मैं उसे ताज़ा टाईम पर लाया तब तक डाक्टर गुप्ता जी अपनी पोस्ट ले आए और वे ठीक ही लाए अपनी तरफ़ से । लिहाज़ा उनकी पोस्ट को तो हमने टच करना मुनासिब न समझा और यह स्पष्टीकरण हमने दर्ज कर दिया ताकि कोई उन्हें नाहक़ इल्ज़ाम न दे क्योंकि वे हमारे लिए आदरणीय हैं ।

डा. श्याम गुप्त said...

----शुक्रिया कुनाल, मज़ा ही तो गज़ल है...महबूब से बात करने से आगे और क्या मज़ा है जहां में ...अब एसी कौन सी बात है जो महबूब से नहीं की जा सकती..तर्जुमन्द लोग जानते हैं कि जब वो सामने आते हैं तो जुबां कुछ कहना चाहती है ...कुछ कहती है...बहुत सी फ़ालतू बातें भी...और गज़ल चलती/ बनती रहती है...

-- सही फ़रमाया जमाल सहब...तभी तो हमने लिखा..
"ग़ज़ल की हो बात जिसमें ,वो ग़ज़ल होती है।"
---अच्छा लतीफ़ा् है ज़नाब...वो क्या कहते हैं शायद...मुकर्रर..आदाब बज़ा लाता हूं ज़नाब...

डा. श्याम गुप्त said...

अभी आगे भी है...गज़ल की गज़ल...

शालिनी कौशिक said...

बहुत शानदार प्रस्तुति.आभार