मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 30, 2011

कांपती इंसानियत

हर   तरफ   मायूसियाँ   ,चेहरों  पर उदासियाँ ,
थी जहाँ पर महफ़िलें ;है वहां तन्हाईयाँ !

कुदरती इन जलजलों से कांपती इंसानियत ,
उड़ गयी सबकी हंसी ;बस गम की हैं गहराइयाँ !

क्यूँ हुआ ऐसा ;इसे क्या  रोक हम  न सकते थे ?
बस इसी उलझन में बीत जाती ज़िन्दगानियाँ !

है ये कैसी बेबसी अपने बिछड़ गए सभी 
बुरा हो वक़्त ,साथ छोड़ जाती हैं परछाइयाँ !

जो लहर बन कर कहर छीन लेती ज़िन्दगी 
उस लहर को मौत कहने में नहीं बुराइयाँ !

हे प्रभु कैसे कठोर बन गए तुम इस समय ?
क्या तुम्हे चिंता नहीं मिल जाएँगी रुसवाइयां  !

शिखा कौशिक 


5 comments:

शालिनी कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

डा. श्याम गुप्त said...

वाह, खूब कहा..
थी जहाँ पर महफ़िलें ;है वहां तन्हाईयाँ !

DR. ANWER JAMAL said...

राह से हटने के बाद इंसान के शिकवे का अर्थ ही नहीं है कुछ , प्रभु तो पावन है सो उसे तो दोष केवल अज्ञानी ही देते हैं ।

shanno said...

बहुत खूब शिखा जी, आपने बहुत सुंदर तरह से भावों को लिखा है....

''क्यूँ हुआ ऐसा ;इसे क्या रोक हम न सकते थे ?
बस इसी उलझन में बीत जाती ज़िन्दगानियाँ !''

Neelam said...

थी जहाँ पर महफ़िलें ;है वहां तन्हाईयाँ !
shikha ji bahut khoob.