मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, April 22, 2011

गज़ल की गज़ल.....डा श्याम गुप्त...

२२-४-११...९ पूर्वान्ह(AM)---

मतला बगैर हो ग़ज़ल,हो रदीफ़ या नहीं |
यह तो ग़ज़ल नहीं ,ये कोई वाकया नहीं |

लय गति हो, ताल सुर सुगम,आनंद रस बहे,
वह भी ग़ज़ल है ,चाहे कोई काफिया नहीं |

अपनी दुकाँ चलती रहे, ठेका बना रहे ,
है उज्र इसलिए, रदीफ़-काफिया नहीं |

अपनी ही चाल ढालते ग़ज़लों को हम रहे,
पैमाना कोई नहीं,  कोई साकिया नहीं |

मतला भी हो रदीफ़ भी,और काफिया रहे,
हो ग़ज़ल पर , अंदाजे बयाँ'श्याम का नहीं ||

4 comments:

Kunal Verma said...

सुन्दर रचना

DR. ANWER JAMAL said...

मैं इसी क्रम को आगे बढ़ाने की इजाज़त चाहता हूँ जनाब डाक्टर साहब ,

अपनी ज़ुबां चलती रहे और कलम भी
परवाह नहीं कुछ कि रदीफ़ क़ाफिया नहीं

पूछा नहीं किसी ने कहा तो माना नहीं
कहीं वजन नहीं और कहीं काफिया नहीं


वाह ! एक उम्दा हठ को अल्फाज़ देने की प्यारी अदा .

डा. श्याम गुप्त said...

अभी आगे भी है ज़नाब..गज़ल की गज़ल...अगले दौर में...

DR. ANWER JAMAL said...

बिलकुल लाइए जनाब , हम भी तैयार ही बैठे हैं .