मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, April 21, 2011

मोहब्बत

इस मोहब्बत का नतीजा ब खुदा कुछ भी नहीँ

ऐसी बीमारी है यह जिसकी दवा कुछ भी नहीँ

खो गयीँ तस्वीरेँ तेरी खो गये तेरे खुतूत

ज़हन मेँ अब तेरी यादोँ के सिवा कुछ भी नहीँ

कब मोहब्बत की ज़बां अल्फ़ाज की मोहताज है

मैँने सब कुछ सुन लिया उसने कहा कुछ भी नहीँ

हमने तुझ को हसरतेँ दीँ,चाहतेँ दीँ,जान दी

ज़िन्दगी हम को मगर तुझ से मिला कुछ भी नहीँ

बाल क्योँ बिखरेँ हुए हैँ,क्योँ यह आंखे लाल हैँ

मैँने पूछा क्या हुआ कहने लगा कुछ भी नहीँ

जिन चराग़ोँ की हिफ़ाज़त कर रहे होँ हौसले

उन चराग़ोँ के मुक़ाबिल यह हवा कुछ भी नहीँ

शर्त तो यह है कि पढने वाली आँख हो

कौन कहता है कि चेहरे पर लिखा कुछ भी नहीँ

लिया गया है:
http://premkibhasha.blogspot.com से।

9 comments:

सारा सच said...

अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

Sushmajee said...

kuch nahi me hi sab kuch hai......

डा. श्याम गुप्त said...

sundar gazal...

shanno said...

बहुत खूबसूरत गजल...

DR. ANWER JAMAL said...

Nice.

DR. ANWER JAMAL said...

Nice.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

मुशायरे पर बढ़िया गजल पेश करने के लिए आपका आभार!

Kunal Verma said...

आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद

वन्दना said...

शर्त तो यह है कि पढने वाली आँख हो

कौन कहता है कि चेहरे पर लिखा कुछ भी नहीँ

वाह ……………कितनी सटीक बात कही है यूं तो पूरी गज़ल ही शानदार है।