मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 30, 2011

खुद को तसल्ली देता रहा


दिन में  खुद को मसरूफ रखा
रातें काटी तेरी याद में अक्सर
दिखाने को हंसता रहा
दिल में हर वक़्त रोता रहा
कमज़ोर ना समझे कोई
बेमन से ज़िन्दगी जीता रहा
एक भी ना मिला
जो हाल-ऐ-दिल पूंछता  
हर शख्श दुखड़े अपने रोता
कैसे रोते को और रुलाता ?
हाल-ऐ-दिल जो अपना सुनाता
निरंतर
खुद को तसल्ली देता रहा
तुम्हारा इंतज़ार करता रहा
30-04-2011
792-212-04-11

5 comments:

शालिनी कौशिक said...

एक भी ना मिला
जो हाल-ऐ-दिल पूंछता
हर शख्श दुखड़े अपने रोता
कैसे रोते को और रुलाता ?
हाल-ऐ-दिल जो अपना सुनाता
निरंतर
खुद को तसल्ली देता रहा
तुम्हारा इंतज़ार करता रहा
bahut marm hriday se abhivyakti pragat ho rahi hai.khoob.

Pradeep said...

"हर शख्श दुखड़े अपने रोता
कैसे रोते को और रुलाता "
सबके अपने अपने गम है......हम इश्क वालो की कौन सुने......हम तो ख़ामोशी से ही काम चला लेते है ...

shanno said...

अपने दुखड़े पर बहुत अच्छी गजल...

डा. श्याम गुप्त said...

---अच्छे भाव हैं...
ये गज़ल नहीं ..स्टेटमेन्ट है....हां रुबाई कहा जा सकता है शायद...

पूंछता = पूछता....बिन्दी नहीं होनी चाहिये...

Neelam said...

कैसे रोते को और रुलाता ?
हाल-ऐ-दिल जो अपना सुनाता
निरंतर
खुद को तसल्ली देता रहा
तुम्हारा इंतज़ार करता रहा
bahut achhi byanagi likhi aapne.