मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, April 26, 2011

एक त्रिपदा गज़ल....डा श्याम गुप्त.....

यादों के ज़जीरे उग आये हैं ,
मन के समंदर में ;
कश्ती कहाँ कहां लेजायें हम |

दर्दे-दिल उभर आये हैं जख्म बने ,
तन की वादियों में;
मरहमे- इश्क कहाँ तक लगाएं हम |

तनहाई के  मंज़र बिछ गए हैं ,
मखमली दूब बनकर ;
बहारे हुश्न कहाँ तक लायें हम |

रोशनी की लौ कोइ दिखती नहीं ,
इस अमां की रात में ;
सदायें कहाँ तक बिखराएँ हम |

वस्ल की उम्मीद ही न रही 'श्याम,
पयामे इश्क सुनकर;
दुआएं कहाँ तक अब गायें हम ||

             ----२६-४-११....६.४८  Pm

2 comments:

शालिनी कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

DR. ANWER JAMAL said...

पढ़ा और अच्छा लगा।
Thanks .