मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, April 22, 2011

याद तो आता हूँ ना !




कभी अगर शाम हो और तन्हाई का आलम हो,
सन्नाटे में चीरता हुआ एक एहसास दिल को तेरे,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें 'आरज़ू' |

सुबह सुबह जब खामोशी से नींद खुलती होगी,
फ़िर आँख खुलते ही मुझे नज़दीक न पाना,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें 'आरज़ू' | 

6 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

भाई सलीम खान ने बहुत उम्दा कलाम पेश किया है!
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डॉ. अनवर जमाल साहिब!
टाइम फारमेट सही न होने के कारण मैंने अपनी एक पोस्ट शैड्यूल कर दी है!
आप सही समय देखकर इसे पब्लिश कर देना!

डा. श्याम गुप्त said...

उम्दा भाव व कलाम...

DR. ANWER JAMAL said...

@जनाब मयंक साहब ! आपकी मंशा के मुताबिक टाइम को सैट कर दिया गया है .
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सलीम साहब का इस्तक़बाल है .

http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/04/blog-post_21.html

Kunal Verma said...

बेहद उम्दा रचना

वन्दना said...

बहुत सुन्दर रचना।

सलीम ख़ान said...

Thanks to all !