मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 30, 2011

दिलों में ख़ारे तास्सुब हैं उनके फूल नहीं


यह क़त्लो खून यह आतिशज़नी, यह लूट खसोट
यह सोची समझी हुई साज़िशें हैं भूल नहीं
फ़सादियों से तवक्क़ो फुज़ूल अम्न की है
दिलों में ख़ारे तास्सुब हैं उनके फूल नहीं
     -असद रज़ा
asadrnaqvi@yahoo.co.in

8 comments:

shanno said...

बहुत खूब ! ''दिलों में खारे तास्सुब हैं...''

शिखा कौशिक said...

बहुत खूब...

Kunwar Kusumesh said...

हर लिहाज़ से बेहतरीन बेहतरीन बेहतरीन क़ता . वाह.

डा. श्याम गुप्त said...

फ़सादियों से तवक्क़ो फुज़ूल अम्न की है---

सच कहा ...बहुत खूब कहा..

DR. ANWER JAMAL said...

आप सभी साहिबान का शुक्रिया .

आशुतोष said...

सत्य बात है....अति सुन्दर

shanno said...
This comment has been removed by the author.
शालिनी कौशिक said...

asad sahab ko ek bar fir hamari aur se bahut bahut badhai.aur anwar jamal ji aapka bahut bahut dhanyawad jo aap hamare liye itni khoobsurat prastuti lekar aa rahe hai.aabhar.