मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 30, 2011

कुछ कतये... डा श्याम गुप्त....


१-
वो तरसे हुए जिस्म करीब आये ,
गुलमोहर के फूल खिलखिलाए |
नगमे स्वयं ही सदायें  देने लगे,
मीठी गुदाज़ रात मुस्कुराए || 
२-
ज़िंदगी इक दर्द का समंदर है,
जाने क्या क्या इसके अन्दर है |
कभी तूफाँ समेटे डराती है,
कभी एक पाकीज़ा मंज़र है ||
३-
खामोश पिघलती हैं शमाएँ ,
किस को कहें क्या बताएं |
ख़ाक हो चुका जब परवाना,
दर्दे-दिल किसको सुनाएँ ||
४-
क्या वह पुरसुकूं लम्हा कभी आयेगा ,
आयेगा तो,  शायद तभी आयेगा |
वक्त कह चुका होगा अपनी दास्ताँ,
श्याम वो वेवक्त वक्त आयेगा ||

8 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

वो तरसे हुए जिस्म करीब आये ,
गुलमोहर के फूल खिलखिलाए |
नगमे स्वयं ही सदायें देने लगे,
मीठी गुदाज़ रात मुस्कुराए ||

Bhai sahab bade romantic nikle aap to ?
Nice .

shanno said...

बहुत खूबसूरत रचना है आपकी, श्याम जी. लेकिन गुजारिश है आपसे..वो ये कि जरा इन मुश्किल उर्दू के शब्दों का हिंदी में मायने भी लिख दिया करें तो हम जैसे कमजोर उर्दू वालों का भला हो जाया करे. वरना हमको पढ़ने के बाद समझने में तकलीफ होती है और यहाँ आने से डर लगता है :)

शालिनी कौशिक said...

क्या वह पुरसुकूं लम्हा कभी आयेगा ,
आयेगा तो, शायद तभी आयेगा |
वक्त कह चुका होगा अपनी दास्ताँ,
श्याम वो वेवक्त वक्त आयेगा |
bahut sundar prastuti.

Dr. shyam gupta said...

शन्नो जी--उर्दू तो मुझे भी काम चलाऊ ही आती है..इसमें तो जमाल भाई माहिर होंगे...वैसे बडी सामान्य उर्दू है इन कतओं में तो...भाषा हिन्दुस्तानी...

-- ज़िस्म= शरीर, गुदाज ==गुदगुदाने वाली. पाकीज़ा= पवित्र, पुरसुकूं=सुकून अर्थात शान्ति प्रदायक...

Dr. shyam gupta said...

धन्यवाद शालिनी व ज़माल साहब..

शिखा कौशिक said...

shayam gupt ji bahut sundar bhavo ko prastut kiya hai aapne .badhai .

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शिखा जी..

shanno said...

शुक्रिया, श्याम जी...पर आपकी उर्दू तो मेरी उर्दू की जानकारी से लाखों गुना अच्छी है. ये आपका बड़प्पन है कि आप अपने मुँह से अपनी तारीफ करते हुये हिचक रहे हैं.