मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, April 29, 2011

आशनायी है...गज़ल...ड श्याम गुप्त....

यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है |
आंधियां भी मगर हम को रास आयीं हैं |

मुश्किलों का है सफ़र जीना यहाँ ऐ दिल ,
हर मुश्किल लेकर नयी इक राह आयी है |

तू न घबराना गर राह में पत्थर भी मिलें ,
पत्थरों में भी उसी रब की लौ समाई है |

डूब कर तरिये इसमें है अभी सागर गहरा ,
कौन जाने न रहे कल को ये गहराई है |

आशिकी उससे करो श्याम ' हो दुश्मन तेरा,
दोस्त,  दुश्मन को बनाए वो आशनाई है ||

              


5 comments:

शालिनी कौशिक said...

आशिकी उससे करो श्याम ' हो दुश्मन तेरा,
दोस्त, दुश्मन को बनाए वो आशनाई है ||
bahut khoob ..

shanno said...

वाह ! वाह ! क्या बात है...''मुश्किलों का है सफ़र जीना यहाँ ऐ दिल ,हर मुश्किल लेकर नयी इक राह आयी है |''

DR. ANWER JAMAL said...

भाई हम तारीफ़ तो कर देंगे लेकिन पहले बताओ कि चुप रहोगे या बोलोगे खिलाफ ?
Nice post.

डा. श्याम गुप्त said...

--बन्दा आदाब बजा लाता है हुज़ूर......

तारीफ़ तो कर, पर यार यूं न कहना ।
तेरी शायरी है या गालिव की आशनायी है ।

शिखा कौशिक said...

बहुत सुन्दर ...बधाई