मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, April 21, 2011

तेरा, मेरा हो जाना....



ख्यालों मै खोना
कुछ खवाब बंज़र जमीन पर बोना
कैसा होता है न
ऐसा, जैसे खुद ही मै खो जाना
ख्यालों मै ही सही
पर तेरा हो जाना
रह ताकना उन राहों की
जहाँ कोई लौट कर नहीं आता
उसी रह पर
कैसा लगता है
मील का पत्थर हो जाना
तेरा जाना फिर भी
उम्मीद दे जाता है
तेरा, मेरा हो जाना....[नीलम]

6 comments:

Kunal Verma said...

बेहद खूबसूरत रचना

shanno said...

वाह ! ''कुछ खवाब बंज़र जमीन पर बोना''...खूबसूरत....

डा. श्याम गुप्त said...

ख्यालों मै ही सही
पर तेरा हो जाना---वाह क्या खूबसूरत ख्याल है...

DR. ANWER JAMAL said...

प्यारी बात और प्यारा अंदाज़ !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

बहुत उम्दा