मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, April 22, 2011

"झंझावात बहुत फैले हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कहने को यदि कुछ होता तो,
क्यों सावन में सूखा रहता।
नदियों में बारह मास सदा,
कल-कल, छल-छल पानी बहता।।
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आज की महफिल-ए मुशायरे में सुनिये
मेरा यह गीत!
जिसे स्वर दिया है
इन्दौर की मशहूर ब्लॉग लेखिका
--


सुख के बादल कभी न बरसे, 
दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

अनजाने से अपने लगते,
बेगाने से सपने लगते,
जिनको पाक-साफ समझा था,
उनके ही अन्तस् मैले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

बन्धक आजादी खादी में,
संसद शामिल बर्बादी में,
बलिदानों की बलिवेदी पर,
लगते कहीं नही मेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

7 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

डॉ. अनवर जमाल साहिब!
मुशायरे में सैटिंग में जाकर टाइम फारमेट सही कर दीजिए।
23 तारीख में पोस्ट की गई प्रविष्टी में भी 21 तारीख ही आ रही है!
इसलिए इस तकनीकी भूल से मैंने अपनी पोस्ट लगा दी है!
यदि समय अन्तराल से पहले ही पोस्ट हो गई हो तो इसे आगे के लिए शैड्यूल कर दीजिएगा!

सलीम ख़ान said...

जिनको पाक-साफ समझा था,
उनके ही अन्तस् मैले हैं!

हरीश सिंह said...

बहुत सुन्दर, वाह मजा आ गया..

Udan Tashtari said...

ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं!



जितना उम्दा गीत, उतनी ही बेहतर धुन एवं गायन!!

डा. श्याम गुप्त said...

शानदार, गीत...उसे क्या कहते हैं..शायद..मरहवा..मरहवा..

Archana said...

शुक्रिया...

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

वाह