मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, April 27, 2011

जो बिछड़ जाते हैं ..


जो  बिछड़  जाते  हैं  ..मेरी आवाज में 
जो बिछड़ जाते हैं हमेशा के लिए 
छोड़ जाते हैं बस यादों के दिए 
जिनकी रौशनी में उनका साथ पाते हैं 
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .

जिन्दगी कितने काँटों से है भरी 
हर दिन कर रही हम सब से मसखरी 
जो चला था घर से मुस्कुराकर  के अभी 
एक हादसा हुआ और आया न कभी 
साथी राहों में ऐसे ही छूट जाते हैं 
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .

रोज सुबह होती और शाम ढलती है 
जिन्दगी की यू ही रफ़्तार चलती है 
वो सुबह और शाम कितनी जालिम है 
जब किसी अपने की साँस थमती है 
हम ग़मों की आग में जिन्दा जल जाते हैं .
वो नहीं आयेंगे ये भूल जाते हैं .
              शिखा कौशिक 

7 comments:

Kunal Verma said...

बहुत ही खूबसूरत

शालिनी कौशिक said...

main to pahle hi sun sun kar bhi bar bar sunna chah rahi thi ab aur aasan ho gaya.vah vah

डा. श्याम गुप्त said...

अच्छी कविता....

DR. ANWER JAMAL said...

पढ़ा भी और सुना भी।
अच्छा लगा। आपने रोज़ को ‘रोज‘ कहा और ज़िंदगी को ‘जिंदगी‘। दोनों जगह आप के J बजाय Z की ध्वनि निकालकर अपना उच्चारण सही कीजिए ताकि प्रभाव में इज़ाफ़ा हो सके।

शिखा कौशिक said...

bhool sudhar ke liye dhanyawad.koshish karoongi ki aage se aisee galti n ho.

DR. ANWER JAMAL said...

Shukriya .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहत सुन्दर प्रस्तुति!