मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, April 26, 2011

मीना कुमारी जी एक बार फिर

 मेरी उदासियों के हिस्सेदार,
मेरे अधूरेपन का दोस्त,
मेरे अकेलेपन
तमाम जख्म जो तेरे,
हैं मेरे दर्द तमाम,
तेरी कराह का रिश्ता है मेरी आहों में .

तूने भी हमको देखा,
हमने भी तुझको देखा,
तू दिल ही हार गुज़रा 
हम जान हार गुज़रे.

जब जुल्फ की कालिख में 
घुल जाये कोई राही
बदनाम सही लेकिन
गुमनाम नहीं  होता.

आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता.

शायरी -मीना कुमारी जी की कलम से.
प्रस्तुति-शालिनी कौशिक एडवोकेट 

13 comments:

Kunal Verma said...

उम्दा पेशकश

DR. ANWER JAMAL said...

वाह ! बहुत खूब .

शिखा कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब

डा. श्याम गुप्त said...

--अब मीना कुमारी की शायरी पर कोई क्या कमेन्ट दे......
-मुशायरों में दूसरों की शायरी भी पेश की जाती है क्या..? मेरे विचार में सिर्फ़ अपने खुद के कलाम ही पेश किये जाने चाहिये....

shanno said...

बेहद खूबसूरत !

DR. ANWER JAMAL said...

डाक्टर साहब ! अपनी शायरी सुनाने के लिए मीना जी क्या अब क़ब्र से उठकर आएंगी ?
वे आएंगी नहीं और ये सुनाएंगी नहीं तो उनकी शायरी तो दम तोड़ देगी महज आपकी बेजा ज़िद के कारण ?
मरी हुई शायरी सुनाने से अच्छा है मरे हुए की शायरी सुनाना ।

शालिनी आप डाक्टर साहब का कमेंट मत पढ़िए और हमें मीना से लेकर गुलज़ार तक , सबकी शायरी पढ़वा दीजिए ।

डा. श्याम गुप्त said...

भई मुशायरे के नाम से तो --सिर्फ़ जो मुशायरे में शामिल/ उपस्थित है उसी की शायरी होती है--आप चाहे कुछ भी कहते रहें---

---मील के पत्थरों की शायरी तो लोग साहित्यिक-ब्लागों, अपने ब्लागों, विशेष ब्लागों पर लिखते हैं....
---खैर यह तो रही सिर्फ़ नियम की बात---मीनाजी की शायरी के तो कहने ही क्या ....

डा. श्याम गुप्त said...

क्या जमाल साहब का मतलब है कि शालिनीजी मरी हुई शायरी करती हैं इसलिये मीनाजी की सुना रही हैं......हा हा हा..

शालिनी कौशिक said...

dr.sahab jab aap ek ungli doosron kee aur uthate hain to ek angootha aur teen ungli swayam ki aur hoti hain baki aap khud bhi bahut samjhdar hain.

DR. ANWER JAMAL said...

@ जनाब डाक्टर साहब ! शालिनी जी की शायरी तो सुनकर मुर्दे भी अंगड़ाइयां लेने लगेंगे। मेरी मुराद कुछ और ही शायरों से थी जो जबरन शायरी की टांग मरोड़ते रहते हैं। हा हा हा

@ शालिनी जी ! आप टेंशन न लें। डाक्टर को डाक्टर ही संभाल लेगा। आप तो बस पढ़ती रहें और पढ़वाती रहें। मुशायरों में अक्सर हूटिंग भी तो होती है। उनकी वजह से शायर अपना कलाम सुनाना नहीं छोड़ते।

शालिनी कौशिक said...

utsah vardhan ke liye shukriya.

डा. श्याम गुप्त said...

अज़ी ज़माल साहब...आप तो शब्दों के अर्थ तक साफ़ साफ़ नहीं समझ पाते..
आपके शब्द...मरी हुई शायरी सुनाने से अच्छा है मरे हुए की शायरी सुनाना ---शालिनी द्वारा शायरी सुनाने पर कहे गये हैं..तो सीधा अर्थ है आप मीना जी की शायरी सुनाने वाले के लिये कह रहे हैं...

--शालिनी जी ये उन्गली वाली फ़टी-पुरानी उक्ति अतार्किक और व्याख्या को न समझने वालों ने, टालू व घिसी-पिटी लीक पर चलने वाले लोगों ने गढी हुई है जिसका कोई अर्थ नहीं है.....
---हां, आप वेवज़ह टेन्शन न लीजिये....तू गाता चल ए यार कोई कायदा न देख....

DR. ANWER JAMAL said...

हा हा हा
अगर यहाँ गुप्ता जी न होते मुशायरे में रंग आधा ही रह जाता ।