मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, April 25, 2011

शाख़-ए-आशियाँ छूट गया, एक 'परिंदा' टूट गया.

शाख़-ए-आशियाँ छूट गया, एक 'परिंदा' टूट गया
अपना कहते-कहते क्यूँ, बीच सफ़र में लूट गया ?

ज़िन्दगी भर साथ निभाने का वादा करके
अब क्यूँ मुझसे वो, पल भर में रूठ गया ?

दुनियाँ भर की सैर कराके मेरा हमसफ़र
मंज़िल से पहले अपने ही शहर में छूट गया !

क़िस्मत क्या ऐसी भी होगी, मालूम न था
साहिल से पहले पतवार समंदर में छूट गया !

दिल तक पहुँचते-पहुँचते महबूब का प्यार
क्यूँ ज़ख्म बन कर जिगर में फ़ूट गया ?

आँखों के तीर ठीक निशाने पर लगाकर 'सलीम'
क्यूँ दिल पर निशाना, एक नज़र में चूक गया ?

3 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

Kamal hai ji kamal hai .

डा. श्याम गुप्त said...

क्यूँ दिल पर निशाना, एक नज़र में चूक गया ?

---vah! jee vaah!!

वन्दना said...

बहुत सुन्दर्।