मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, April 24, 2011

कैसी --कैसी गज़लें --- डा श्याम गुप्त.....

-------कल शाम से आठ घन्टों में किसी ने अपनी रचना नही डाली--सलीम जी की रचना २५-४-११ को शेड्यूल है, तो ज़नाब सद्र साहब की अनुमति से में ही अपनी रचना डाल देता हूं---लीजिये..... झेलिये....
  


          कैसी --कैसी गज़लें --


(पेश है एक -हुश्ने-हज़ारी  गज़ल...--जिसमें सभी शे’र मतले के हों...)

शेर मतले का न हो ,तो कुंवारी ग़ज़ल होती है।
हो काफिया ही जो नहीं ,बेचारी ग़ज़ल होती है।


और भी मतले हों ,हुस्ने तारी ग़ज़ल होती है ,
हर शेर ही मतला हो ,हुश्ने-हजारी ग़ज़ल होती है।


हो रदीफ़ काफिया नहीं ,नाकारी ग़ज़ल होती है,
मकता बगैर हो ग़ज़ल वो मारी ग़ज़ल होती है।


मतला भी ,मक्ता भी , रदीफ़-काफिया भी हो ,
सोच -समझ के, लिख के, सुधारी ग़ज़ल होती है ।


हो बहर में ,सुर ताल लय में ,प्यारी ग़ज़ल होती है ,
सब कुछ हो कायदे में ,वो संवारी ग़ज़ल होती है।


हर शेर एक भाव हो,  वो जारी ग़ज़ल होती है,
हर शेर नया अंदाज़ हो ,वो भारी ग़ज़ल होती है।


मस्ती में कहदें झूम के, गुदाज़कारी ग़ज़ल होती है,
उनसे तो जो कुछ भी कहें ,मनोहारी ग़ज़ल होती है।


जो  वार  दूर तक करे ,  करारी   ग़ज़ल  होती  है,
छलनी हो दिले-आशिक,वो शिकारी ग़ज़ल होती है।


हो दर्दे-दिल की बात,  दिलदारी ग़ज़ल होती है,
मिलने का करें वायदा, मुतदारी ग़ज़ल होती है।


जो उस की राह में कहो ,  इकरारी ग़ज़ल होती है,
कुछ अपना ही अंदाज़ हो,खुद्दारी ग़ज़ल होती है ।


 तू गाता चल  ऐ यार !  कोई   कायदा  न देख ,
अंदाजे-बयाँ हो श्याम’ का,वो न्यारी ग़ज़ल होती है॥

----०९.१० AM 24/4/11...



5 comments:

shanno said...

इस गजल को झेलना बहुत अच्छा लगा. श्याम जी :)बहुत बढ़िया रचना...

Kunal Verma said...

झेलने मेँ मजा आया श्याम जी

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बढ़िया!
आप लिखते रहें हम पढ़ते रहेंगे!

DR. ANWER JAMAL said...

भाई डाक्टर साहब ! आपके अंदर तो मामला लबालब है। वाक़ई , मज़ा आ गया आज तो।
और आपके अंदर तो हास परिहास का माद्दा भी भरपूर है ।
आपकी भूमिका भी अच्छी लगी ।

डा. श्याम गुप्त said...

शुक्रिया..कुनाल. शन्नो जी--व सद्र जी...हौसला अफ़ज़ायी के लिये...लिखते रहेंगे..

--- अनवर जी--
" पुर हूं में शिकवे से,यूं राग से जैसे बाज़ा ।
इक जरा छेडिये, फ़िर देखिये क्या होता है ॥"