मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, April 23, 2011

तुम चली गयीं तो जैसे रौशनी चली गयी


तुम चली गयीं तो जैसे रौशनी चली गयी
ज़िन्दा होते हुए भी जैसे ज़िन्दगी चली गयी

मैं उदास हूँ यहाँ और ग़मज़दा हो तुम वहाँ
ग़मों की तल्खियों में जैसे हर ख़ुशी चली गयी

महफ़िल भी है जवाँ और जाम भी छलक रहे
प्यास अब रही नहीं जैसे तिशनगी चली गयी

दुश्मनान-ए-इश्क़ भी खुश हैं मुझको देखकर
वो समझते है मुझमें अब दीवानगी चली गयी

तुम जो थी मेरे क़रीब तो क्या न था यहाँ 'सलीम'
इश्क़ की गलियों से अब जैसे आवारगी चली गयी

4 comments:

डा. श्याम गुप्त said...

वाह !!!!!!!!!!! क्या बात है ...

इश्क़ की गलियों से अब जैसे आवारगी चली गयी...बहुत खूब...

Kunal Verma said...

बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ

वन्दना said...

बडी ज़बरदस्त गज़ल लिखी है सलीम जी…………शानदार प्रस्तुति।

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

इश्क़ की गलियों से अब जैसे आवारगी चली गयी
खूबसूरत