मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, April 21, 2011

डा श्याम गुप्त की गज़ल...ए ज़िन्दगी...

इक नज़र मेरी तरफ़ भी देख ले ए ज़िन्दगी ।
दिल को  टूटे आईने में, देख ले  ऐ ज़िंदगी |

हमने तेरी राह में दीपक जलाए रात भर ,
तू न आई करम अपना देख ले ऐ ज़िंदगी |

हम तो तेरी राह में बन करके गुल बिछते रहे,
प्रीति का एसा चलन,  तू सीख ले  ऐ ज़िंदगी |

तुझसे शिकवा क्या करें,अब तो गिला कोई नहीं,
सब गिले शिकवे भुला कर, देख ले ऐ ज़िंदगी |

चलते- चलते  दूर से ही , इक नज़र मुड़ देख ले,
श्याम,  हम अब भी वहीं हैं,  देखले ऐ ज़िंदगी ||

8 comments:

Kunal Verma said...
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Kunal Verma said...

इस गजल को बेहद खूबसूरत पिरोया है आपने जनाब
http://premkibhasha.blogspot.com

DR. ANWER JAMAL said...

रचना सुंदर है डाक्टर साहब !
कृप्या पिछली पोस्ट को मिलने वाले 8 घंटे का समय पूरा होने की इंतजार और कर लेते ।

डा. श्याम गुप्त said...

सभ्री जनों को धन्यवाद...
--जमाल साहब..

यह रचना ३.१४ am पर नहीं २१-४...PM par likhee gaee hai...शयद लेप्टोप के समय मे कुछ गडबड है...देखते हैं...

shanno said...

बहुत ही अच्छी गजल....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

डॉ. श्याम गुप्त जी ने बहुत उम्दा गजल पेश की है!
शेयर करने के लिए शुक्रिया!

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शास्त्री जी....

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

सुंदर रचना