मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, April 18, 2011

अमानत


काफ़ी है अर्ज़े-ग़म के लिए मुज़महिल हंसी
रो-रो के इश्क़ को तमाशा न बनाइये
बेमौत मार डालेंगी ये होशमंदियां
जीने की आरज़ू है तो धोके  भी खाइये
- ख़ुमार  बाराबंकवी
मुज़महिल-मंदी,थकी हुई सी 

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बढ़िया शेर!
बहुत उम्दा!

शालिनी कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब , मुकर्रर इरशाद. सुबहानल्लाह.

DR. ANWER JAMAL said...

@ Shalini ji ! मुझे उम्मीद थी कि कोई न कोई अक्लमंद इस जुमले का ऐसे ही इस्तेमाल करेगा .
आपने ब्लॉग पर मौजूद इस सुविधा से अच्छा फायदा उठाया है.

shanno said...

बहुत खूब !