मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, April 20, 2011

नज़्म--न मैं कवि न शायर...---डा श्याम गुप्त

न मैं कवि, न शायर, ग़ज़लगो,न मैं  कोई गीतकार हूँ |
उठती है दिल में बात जो , मैं उसी का निबहगार हूँ ||

इस दिल में जब भी उठी सदा,
ये दिल कभी जो मचल गया |
वो गुबार जो उनकी याद का,
यूं जुवान पै आके संभल गया |

कोंई  देश  पै  कुर्बां हुआ ,
कोई राष्ट्र हित कुछ कर गया|
कोई अपनी सारी ज़िंदगी ,
इंसानियत पै लुटा गया  |

जो कसीदे उन के लिख दिए,
जो जुबाँ से गीत फिसल गया |
वही नगमे सुर में गादिए ,
मैं न कोई कलमकार हूँ  |

न मैं कवि न--------------------------------|
उठती है ------------------------------------||

कुछ लोग झुककर जो बिछ गए ,
कुछ चंद सिक्कों में बिक गए |
कुछ  अहं में  ही  अकडे रहे ,
कुछ  बंधनों  में  जकड गए |

साहित्य कविता औ छंद के,
ठेके सजाएं वे सब सुनें |
रटकर के चंद विधाओं को,
ख़म ठोकते हैं वे सब सुनें |

हर बात जिसमें समाज हित,
हर वाक्य जिसमें है जन-निहित |
हर विधा संस्कृति -देश हित,
उसी कविता-कवि का प्यार हूँ |

न मैं कवि न ---------------------------------------|
उठती है --------------------------------------------||

मैंने बिगुल फूँका काव्य का,
साहित्य की रची रागिनी |
इतिहास औ वीरों के स्वर,
रची धर्म की मंदाकिनी ||

मैंने दीं दिशाएँ समाज को,
मैं इतना तो गुनहगार हूँ |
लिखदूं, कहूं, मैं गाता रहूँ ,
मैं इंसान सदाबहार हूँ || 


न मैं कवि, न शायर, ग़ज़लगो,न मैं  कोइ गीतकार हूँ |
उठती है दिल में बात जो ,मैं उसी का निबहगार हूँ ||

----२०-४-२०११---१२.४० PM

8 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

डॉ. श्याम गुप्त जी।
मुशायरे को सुन्दर नज्म से सजाने के लिए आपका शुक्रिया।
--
वाकई में रचनाओं का जन्म इन्हीं उदगारों से होता है!

DR. ANWER JAMAL said...

आप इंसान सदाबहार हैं ।
आप इंसान मज़ेदार हैं ।।

Kunal Verma said...

इतनी खूबसूरत नज़्म पढकर मुझे आपको कहने के लिए कोई लफ्ज नहीँ मिल रहा

Sadhana Vaid said...

आपकी रचना के माध्यम से आपके राष्ट्र प्रेम से भरे नेक दिल के दर्शन हो रहे हैं ! बधाई स्वीकार करें !

Neelam said...

Aapki rachna aapke saakshaat darshan kara gayi. bahut sunder vichaar ,jitni tareef ki jaaye kam hai...
न मैं कवि, न शायर, ग़ज़लगो,न मैं कोई गीतकार हूँ |
उठती है दिल में बात जो , मैं उसी का निबहगार हूँ ||

badhai sweekar karen.

Neelam said...

Aapki rachna aapke saakshaat darshan kara gayi. bahut sunder vichaar ,jitni tareef ki jaaye kam hai...
न मैं कवि, न शायर, ग़ज़लगो,न मैं कोई गीतकार हूँ |
उठती है दिल में बात जो , मैं उसी का निबहगार हूँ ||

badhai sweekar karen.

डा. श्याम गुप्त said...

धन्यवाद शास्त्रीजी, यह तो आपकी ज़र्रा नवाजी....

--धन्यवाद जमाल जी--
आप इन्सान ज़नाबे-यार हैं...

--धन्यवाद कुनाल व नीलम जी..

- ...ओह तो आप "किरन" जी की सुपुत्री हैं.-साधना वैद जी.... हम भी आगरा वाले हैं जी..धन्यवाद .

shanno said...

वाह ! वाह !

''हर बात जिसमें समाज हित,
हर वाक्य जिसमें है जन-निहित |
हर विधा संस्कृति -देश हित,
उसी कविता-कवि का प्यार हूँ |''

डा. साहब, वैसे तो पूरी रचना ही आपने इतनी खूबसूरत लिखी है कि क्या कहूँ...